हो जाएगी ढिबरी टाइट

यूं तो मुझे हॉरर सिनेमा और हॉरर साहित्य, दोनों में ही खास दिलचस्पी नहीं है, लेकिन हाल ही में फ्लाईड्रीम्स से प्रकाशित, वरिष्ठ लेखक मनमोहन भाटिया जी की नई किताब का टाइटिल और कवर इतना सम्मोहक लगा कि इसे पढ़े बिना न रह सका.इसक अनोखी किताब का नाम है अदृश्यम. करीब पौने दो सौ पन्नों की इस किताब को जब मैंने पढ़ना शुरू किया तो लगा कि यह एक आम सी हॉरर कहानी होगी, लेकिन जैसे-जैसे यह कहानी आगे बढ़ती जाती है, पाठक का रोमांच और कौतूहल भी बढ़ता जाता है.

सुदर्शन और विवेक नाम के दो मध्यवयी मित्रों के इर्दगिर्द घूमती यह कहानी, कहानी क्या बल्कि उनके इर्दगिर्द भूत और भूतनियां घूमते हैं, एक तरह का भूतोपीडिया है, जिसमें पाठकों को तरह-तरह के भूतों से दो-चार होना पड़ता है. लेकिन, गनीमत यह है कि ये भूत सिर्फ उसे ही नुकसान पहुँचाते हैं, जिसने उन्हें नुकसान पहुँचाया हो. बाकी लोगों के लिए ये भूत बहुत भले हैं और तरह-तरह से उनकी मदद ही करते नजर आते हैं.

पुस्तक का नाम अदृश्यम जरूर है, लेकिन इसके भूत-भूतनियाँ परम्परागत भूतों की तरह अदृश्य नहीं हैं, बल्कि आम लोगों द्वारा आसानी से देखे-सुने जा सकते हैं. और सुदर्शन व विवेक से तो इनका जन्म-जन्मांतर का नाता है. वे जहाँ भी जाते हैं, भूतों और भूतनियों को अपना इस्तकबाल करते पाते हैं. भूतों से इनकी वाकफियत इतनी पुरानी है कि उन्हें भूतों से डर लगना बंद हो चुका है. बल्कि वे खुद को भूतज्ञ कहलाना पसंद करते हैं. अदृश्यम की दृश्यमान भूतनियाँ बिल्ली का रूप धरकर रहना पसंद करती हैं और भूत सामान्य मनुष्यों का. ये गाड़ी ड्राइव करते हैं, सिगरेट पीते हैं. सबके भूत योनि में रहने की अलग-अलग वजह हैं. अपनी इच्छा या इंतकाम पूरा होने पर वे भूत योनि से मुक्त हो जाते हैं.

इन्हीं के बीच एक ढिबरी टाइट करने का माहिर सुभाष भी है, जो बिना भूतों के भी लोगों को भूतों की दहशत से दहला सकता है. लेकिन, नायक द्वय की ढिबरी टाइट करने वाला सुभाष या कोई भूत नहीं है, बल्कि एक आम इंसान है, जिसके आगे वे पहली बार दहशत में आ जाते हैं.

इस सरस और सहज ढंग से लिखी गई कहानी में भुतहा रचनाओं की तरह हिंसा या खून-खराबे की ज्यादा मात्रा नहीं है, जिसकी वजह से यह वितृष्णा पैदा करने की बजाए रोमांच बनाए रखती है. कहानी के बारे में ज्यादा बताना इसका मजा किरकिरा करना होगा. बस भूतों के नए-नए रूपों से साक्षात करते हुए इस किताब को एन्जॉय कीजिए. भाटिया जी के भूत न रामसे बंधुओं के भूतों की तरह वीभत्स हैं और न विक्रम भट्ट के भूतों से इलीट. अलबत्ता ये रामगोपाल वर्मा के भूतों की तरह कहे जा सकते हैं, जो अपनी गतिविधियों से उत्सुकता पैदा करते हैं.अदृश्यम को खरीदने के लिए आप इस लिंक का इस्तेमाल कर सकते हैंः https://www.amazon.in/dp/8194113156/?fbclid=IwAR0i7m_68AHbX2k0l-CRVr-YVDljkF7Kc4QOWLuzoqtYHazvdyUQXXy6nBw

  • संदीप अग्रवाल

2 thoughts on “हो जाएगी ढिबरी टाइट

  1. संदीप जी एक वरिष्ठ पत्रकार, समीक्षक और गुणीजन है। उनके द्वारा मेरी किताब की समीक्षा मेरे लिए सौभाग्य की बात है। मैं उनका आभार प्रकट करता हूँ।

  2. बेहद सुलझे हुए शब्दों में संदीप जी ने ” अदृश्यम ” की इतनी सुन्दर समीक्षा लिखी है जो नए पाठक के मन में जिज्ञासा अवश्य ही उत्पन्न कर देगा और जिज्ञासा बढ़ेगी तो पाठक भी बढ़ेंगे।

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