लगन को नमन

शनिवार को नागपुर के रविनगर स्थित अग्रसेन भवन में प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सामाजिक वार्षिक पत्रिका “अग्रचिंतन” के 24वें अंक का लोकार्पण किया गया.

आज जब हर ओर माहौल प्रकाशनोद्योग के प्रतिकूल बना हुआ है, किसी पत्रिका का अबाध सफर जारी रखते हुए 25 वें वर्ष में प्रवेश यकीनन गौरव और हर्ष, दोनों की बात है. लेकिन जब पता चलता है कि पत्रिका के संयोजन और प्रकाशन के पीछे एक अकेले व्यक्ति की लगन और मेहनत है, तो इसमें आश्चर्य का भी समावेश हो जाता है!
यह शख्स हैं, दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जो विगत 24 वर्षों से तरह-तरह की चुनौतियों का सामना करते हुए, उन पर विजय पाते हुए इसका प्रकाशन जारी रखे हुए हैं. पिछले साल जब कोरोना ने सारी व्यावसायिक गतिविधियों के पहिए थाम दिए थे, यह दुर्गाप्रसाद जी के जुनून और जिजीविषा का ही नतीजा है कि अग्रचिंतन का प्रकाशन उन्होंने तब भी नहीं रुकने दिया.

इस पत्रिका ने अपने आरंभ से ही बहुत उतार-चढाव देखे हैं. दुर्गाप्रसादजी को अग्रचिंतन के प्रकाशन की प्रेरणा अपने श्रद्धेय पिता, स्वतंत्रता सेनानी व महान समाजसेवी श्री हरिकिसन जी अग्रवाल (1920-1989) से मिली. हरिकिसनजी ने 1952 में तत्कालीन राष्ट्रीय एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य में “अग्रवाल समाचार” नामक राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन संपादन करके अग्रवाल समाज में पुनर्जागरण का शंखनाद किया था. उस समय इस पत्र ने हर स्तर पर समाज के संगठन को मजबूत करने और सामाजिक चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हरिकिसनजी ने पत्रकारिता में विशिष्ट पहचान क़ायम करते हुए 1956 में “अग्रवाल समाचार” को “राष्ट्रदूत” के रूप में परिवर्तित करके जन जन से जोड़ दिया। पहले हिन्दी – मराठी साप्ताहिक और बाद में मध्य भारत के पहले हिन्दी सांध्य दैनिक के रूप में प्रारंभ राष्ट्रदूत आज भी प्रकाशित हो रहा है. दुर्गा प्रसाद जी ने लंबे अर्से तक प्रत्यक्ष पत्रकारिता करते हुए इस क्षेत्र में अपना मुकाम बनाया. 1997 में हरिकिसन जी को अपना प्रेरणास्रोत बनाकर दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने “अग्रवाल समाचार” को “अग्रचिंतन” के रूप में पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया और तब से यह सिलसिला निरंतर जारी है. पाक्षिक के रूप में प्रारंभ “अग्रचिंतन” विविध कारणों से नियमित प्रकाशन नहीं बन पाया परंतु दुर्गाप्रसाद जी ने वार्षिक विशेषांक के रूप में इसका शानदार प्रकाशन जारी रखा.

“अग्रचिंतन” प्रत्यक्षतः देश के अग्रवाल समाज की पत्रिका के रूप में प्रतिष्ठित है, लेकिन एक संपादक के तौर पर दुर्गाप्रसाद जी ने कभी इसे राष्ट्रीय व सामाजिक सारोकारों से विलग नहीं होने दिया है और लगभग हर अंक में जनमानस और लोकहित से जुड़े किसी न किसी मुद्दे को अंक की थीम बनाया है.
अग्रचिंतन के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषांकों में धर्म-संस्कृति विशेषांक, सबका साथ-सबका विकास विशेषांक, गाँधी शतकोत्तर स्वर्ण जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में गाँधी जी पर एकाग्र अंक, सामाजिक न्याय विशेषांक, गौमाता विशेषांक, कोरोना विशेषांक आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिनके माध्यम से पत्रिका ने लगातार समसामयिक विषयों की नब्ज पर पकड़ बनाए रखी है. पिछले साल अग्रचिंतन ने दीवाली विशेषांक निकालकर कोरोना के कारण फैली वैश्विक निराशा के अंधकार में उत्साह और उम्मीदों का उजाला भरने का प्रयास किया था तो इस बार अग्रसेन जयंती विशेषांक के रूप में अग्रवाल समाज की विभूतियों को श्रद्धासुमन अर्पित किए हैं और अग्रवाल समाज का गौरव बढ़ाने वाले अग्र बंधुबांधवों से समाज को परिचित कराया है.
आमतौर पर अग्रवालों को सिर्फ व्यवसायी वर्ग के रूप में देखा जाता है, लेकिन इस अंक में प्रकाशित लेख आजादी के अमर अग्रवाल सेनानी लाला लाजपत राय, क्रांतिकारी मास्टर अमीरचंद, डॉ. राममनोहर लोहिया, सेठ जमनालाल बजाज जैसे नामचीन दिग्गजों और लाला हंसराम अग्रवाल, लाला घासीराम, लाला भैरोप्रसाद, लाला ईश्वरी दास, श्री मोहन लाल पित्ती, श्री रामप्रकाश अग्रवाल आदि के बारे में बताता है कि किस प्रकार भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अग्रवालों के योगदान और बलिदान के जिक्र के बिना अधूरा है. दुर्गाप्रसाद जी बताते हैं कि अग्रचिंतन अग्रवाल समाज का प्रतिनिधित्व करने वाला तो है ही, साथ-साथ अग्रगामी चिंतन अर्थात फाॅरवर्ड थिंकिंग का भी प्रतीक है. एक और चीज, जिसके साथ इस गौरवशाली पत्रिका ने कोई समझौता नहीं किया है, वह है इसकी भव्यता. इसका प्रत्येक अंक न सिर्फ संपादन, मुद्रण कला की उत्कृष्टता का परिचायक होता है, बल्कि तकनीकी रूप से भी बहुत विस्मयकारी होता है. कवर पर हाथ रखो तो वह किसी सपाट कांच की शीट जैसा आभास देता है, लेकिन अगर उसके भीतर तक झाँकों तो उसमें गहराई तक नजरें उतरती चली जाती हैं. बढ़िया क्वालिटी के पेपर पर पत्रिका को प्रकाशित करते रहना, बेशक बेहद खर्चीला काम है, लेकिन दुर्गाप्रसाद जी ने इसमें कभी कोई गिरावट नहीं आने दी है. हालांकि वह सफलता के इस सफर का श्रेय अपनी लघु टीम, अग्रवाल समाज के सदस्यों, पत्रिका के पाठकों, विज्ञापनदाताओं को देते हैं, लेकिन सच यही है कि इस यात्रा का 24 वें पड़ाव तक आ पहुँचना उनकी स्वयं की लगन, श्रम और कर्मठता के बूते पर ही संभव हो सका है. सफलता के इस सफर की कहानी सौ. सविता दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी के उल्लेख के बिना अधूरी ही कही जाएगी, जिन्होंने न सिर्फ घर में एक गृहिणी के रूप में सभी जिम्मेदारियों को पूरा किया, बल्कि कार्यस्थल पर पत्रिका के प्रकाशन में भी पति के कंधे से कंधा मिलाकर एक आदर्श सहचरी की भूमिका का भी बखूबी निर्वहन किया.
यह सफर यूं ही अबाध जारी रहे और अग्रचिंतन निरंतर फले-फूले, यही हमारी हार्दिक शुभकामना है.

2 thoughts on “लगन को नमन

  1. असलम शेख़

    Reply

    निःसंदेह, मित्र दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की ज़िद और लग्न ने इस पत्रिका “अग्रचिंतन” को निरंतर गत पच्चीस वर्षों से समाज की अग्रसर पत्रिका की पहचान दिलाई है, आप का अभिनंदन है.

Add Comment