सवालों का सवार

बहुत दिनों बाद एक ऐसी किताब हाथ में आई, जिसे एक ही सिटिंग में पूरा किए बिना चैन नहीं मिलने वाला था. प्रागैतिहासिक युग के परिवेश में रची यह कहानी अलबेला की है, जिसके सवाल ही उसकी संजीवनी हैं और उसकी प्रेरणा भी.

अलबेला से पहली बार मिलते ही हम उसमें अपने आपको देखते हैं, तमाम तरह के सवालों से घिरे हुए. बस फर्क यही है कि हमारी तरह उसे सवाल परेशान नहीं करते, बल्कि वह खुद उनके जवाब जानने के लिए हठ की बजाए संघर्ष करता है. आज हमारे पास हमारी अधिसंख्य जिज्ञासाओं के समाधान के लिए भाँति-भाँति के संसाधन मौजूद हैं, लेकिन इस अलबेले नायक को हर सवाल का जवाब पाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और इस मेहनत का उसे अच्छा फल भी मिलता है.
जिन्हें ईवॉल्यूशन के बारे में जानकारी है, उन्हें तो यह किताब बहुत फेमिलअर लगेगी ही, लेकिन जो इस विषय को जटिल मानते हैं, उनके लिए तो यह किताब कुछ ज्यादा ही उपयोगी है. कैसे अलबेला को पत्थर से कुल्हाड़ी, बाँस से तीर-कमान, सींग से तुरही और पशु की खाल से ढोल या मिट्टी और पत्थरों से सुरक्षा-दीवार बनाने का रास्ता मिलता है, वह बेहद रोचक है. और बताता है कि हमेशा आवश्यकता ही आविष्कार की जननी नहीं होती, बल्कि कई बार आविष्कार ही आवश्यकताओं के जनक बन जाते हैं.
यह अन्वेषी नायक युवा होते-होते एक ऐसे महानायक के रूप में उभरता है, जिस पर पूरी मानव जाति की रक्षा का दायित्व आ जाता है. लेकिन उसके आचरण में कहीं भी एक सुपरहीरो वाली अविश्वसनीयता नहीं है, बल्कि उपलब्ध संसाधनों और परिस्थितियों को अपने कुशल नेतृत्व से अपने पक्ष में ढालने का अद्भुत सामर्थ्य है. वह शत्रु को अपने पराक्रम से भी जीत सकता है और अपने व्यवहार से भी.
अलबेला के किरदार को विविध आयाम देने के लिए उसमें उसकी सखा बिजुरी है,एक बच्चा झरना है, उसके पूर्वजन्म का वृद्ध मित्र अजूबा है जो अपने नाम से भी ज्यादा अजूबा है. वही है जो अलबेला को उसके अस्तित्व में होने का उद्देश्य समझाता है.
एक रोमांचकारी यात्रा के साथ आगे बढ़ती यह कहानी कब अलौकिकता के संसार में प्रवेश कर जाती है, पता ही नहीं चलता और पाठक खुद को सभ्यता के विकास के एक नए अध्याय में मौजूद पाता है.
किताब की भाषा बेहद सरल है और शैली काफी रोचक, लेकिन इसका प्रवाह तो अद्भुत है. भावनाओं और घटनाओं के बीच संतुलन साधे हुए यह सवा दौ सौ पेज की कहानी कब खत्म हो जाती है, पता ही नहीं चलता. पढ़ते हुए लगता ही नहीं कि आप किताब पढ़ रहे हैं, ऐसा लगता है कि जैसे आप अपने कल्पना पटल पर हर दृश्य को किसी फिल्म की तरह चलते देख रहे हों. पुस्तक में बीच-बीच में दिए गए रेखांकन इसे और अधिक दिलचस्प बनाते हैं.
संक्षेप में कहा जाए तो पुस्तक न सिर्फ पठनीय है, बल्कि संग्रहणीय भी है.
इस अनूठी किताब के लिए इसके लेखक अरविंद नेगी को ढेर सारी बधाईयाँ व शुभकामनाएं… और फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस को भी, जो दो ही वर्ष में प्रकाशक से ज्यादा एक जौहरी साबित हुए हैं, जो अनगढ़ हीरों की परख और उनमें छिपी अपार संभावनाओं के आकलन में माहिर हो चुका है.

संदीप अग्रवाल

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