‘बैटर’ इज बेटर

स्त्री—पुरुष समानता की अगर बात करें तो महिलाओं ने एक और उपलब्धि अपने खाते में दर्ज की है. इस दिशा में एक सशक्त पहल की है, मैरिलबोन क्रिकेट क्लब ने. जिसने क्रिकेट के खेल में भविष्य में बैट्समैन की जगह बैटर शब्द का इस्तेमाल किए जाने की घोषणा की है.

महिला क्रिकेट खिलाड़ियों की लंबे समय से शिकायत रही है कि उन्हें तमाम अच्छे प्रदर्शन के बावूजद न तो ​पुरुष खिलाड़ियों जितना पैसा मिलता है और न ही अहमियत. बैट्समैन को बैटर कहने से इस हालात में कितना बदलाव आएगा, कहना मुश्किल है, लेकिन एक महत्वपूर्ण बदलाव तो यह है ही.

Image courtesy: Openclipart_vector(Pixabay)

यह मेल डोमिनेटिंग सोसाइटी के लिए एक और सबक है, जिसने ​अधिकतर पदों और दायित्वों को जेंडर न्यूटरल रखने में हमेशा से काफी कोताही बरती है.

यह फर्क सेल्समैन और सेल्सगर्ल में बेशक स्पष्ट दिखता था, लेकिन अधिकतर जगहों पर महिलाओं को भी पुरुष संबोधनों का सामना करना पड़ता था. लेकिन फिर धीरे—धीरे प्रगतिवादी स्त्रियों और लैंगिक समानता के पक्षधरों को इस कमी को दूर करने की जरूरत महसूस होने लगी.

इसी जरूरत को पूरा करने के लिए सेल्स गर्ल्स और सेल्समैन को सेल्सपर्सन्स कहा जाने लगा और चेयरमैन को चेयरपर्सन. लेकिन कई बार भाषा को लेकर बड़ी भ्रमपूर्ण स्थिति बन जाती है. जैसे प्रेसिडेंट मेल भी हो सकता है और फीमेल भी हो सकती है. लेकिन हिंदी में अगर कभी कहीं कोई महिला राष्ट्रपति बनती तो इसका मजाक उड़ाया जाता है कि एक महिला ‘पति’ कैसे हो सकती है तो इसका जवाब राष्ट्राध्यक्ष शब्द में तलाशा गया. बैट्समैन और महिला बैट्समैन, दोनों के लिए हिंदी में पहले से बल्लेबाज शब्द मौजूद है.

कई जगह तर्क दिया जाता है कि कुछ शब्द अपने आप में ही जेंडर न्यूट्रल होते हैं, जैसे मंत्री या सचिव, इन्हें ऐसे ही छोड़ देना चाहिए. इसलिए वैसे तो इसे लेकर कोई नया बखेड़ा खड़ा न करते हुए, लचीला रूख ही अपनाया गया है, लेकिन कई बार जोश में कुछ अतिरेकपूर्ण कदम भी उठाए गए, जैसे एक्टर और एक्ट्रेस का फर्क मिटाकर कुछ सालों से एक्टिंग करने वाले स्त्री—पुरुषों को एक्टर ही कहा जा रहा है, जबकि स्टार के जवाब में अलग से स्टारलेट शब्द का यूज शुरू किया गया. हिंदी में अभी भी उन्हें अभिनेता और अभिनेत्री के रूप में संबोधित किया जाता है.

कुछ लोग इसे टोकनिज्म करार देते हुए एकदम गैरजरूरी मानते हैं, लेकिन एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि आखिर क्यों महिलाओं को पुरुषों वाले संबोधनों से पहचाना जाना चाहिए. अगर सुपरमैन दुनिया भर में पॉपुलर है तो सुपरगर्ल का फैनबेस भी कुछ कम बड़ा नहीं है.

बेशक वूमैन एम्पॉवरमेंट के लिए शब्दों का हेरफेर काफी नहीं है, लेकिन यह एक स्टीरियोटाइप माइंड सेट को चेंज करने में इम्पोर्टेंट रोल तो प्ले करता ही है. सोच बदलेगी, तभी तो हालात बदलेंगे.

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