कॉपीराइट का राइट एंगल

एक लेखक के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या होगी, कि उसकी कोई किताब पब्लिश हो कर लोगों तक पहुँचे. लेकिन, यह खुशी उस वक्त काफूर हो जाती है, उनकी किताब की नकल या किताब इल-लीगली पीडीएफ रूप में तैयार होकर ऑनलाइन दिखने लगती है, और उसे इसकी कानोकान खबर तक नहीं हो पाती. हो भी जाए तो वह शिकायत करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता.

लेखक को लगता है कि अपनी रचना के साथ © + और अपना नाम लिख देने से उसके कॉपीराइट सुरक्षित हो गए हैं.

ऐसे में इस बात की जरूरत महसूस होती है कि हर लेखक को कॉपीराइट के बारे में न सिर्फ जानकारी हो, बल्कि इसका लाभ उठाने को लेकर जागरूकता भी हो. लेकिन कड़वी हकीकत यही है कि जिस लेखक वर्ग के हित इस कानून से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, उसे ही इसके बारे में कोई खास जानकारी नहीं होती.

फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को देखें तो सबसे ज्यादा कॉमन बात यह देखने में आती है, वह यह है कि लेखक को लगता है कि अपनी रचना के साथ © + और अपना नाम लिख देने से उसके कॉपीराइट सुरक्षित हो गए हैं.
इसे मासूमियत भी कह सकते हैं लेकिन वास्तविकता यही है कि हम जब भी किसी प्रोफेशन में उतरते हैं तो सबसे पहले उन चीजों की जानकारी हासिल करते हैं, जो हमें संभावित नुकसान से बचा सकती हैं. फिर सृजन करते हुए हम इतनी लापरवाही से काम क्यों लेते हैं, यह समझ से परे की बात है. ऐसे देश में जहाँ हर रोज हजारों की तादाद में कविताएं, कहानियां और दूसरी चीजें लिखी जाती हैं, ऐसा रचनात्मक काम उंगलियों पर गिने जाने लायक ही मिलेगा,, जिसे उसके रचयिता द्वारा कॉपीराइट के अंतर्गत सुरक्षित कराया हो.
अगर आप एक पेशेवर रचनाकार हैं तो आपको इस कानून के बारे में जानना बहुत जरूरी है, ताकि आपकी महीनों, कई बार सालों की भी, मेहनत का श्रेय और फायदे कोई और न ले जा सके. सबसे पहले तो इस बात को जानना जरूरी है कि आपकी कोई भी मौलिक रचना, चाहे वह संगीत है, चित्र है, चलचित्र है या लेखन, उस पर पहला अधिकार आपका ही है और आपकी लिखित अनुमति के बिना कोई भी उसका, या उसके किसी भी अंश का किसी भी प्रकार से, किसी भी रूप में प्रकाशन या प्रस्तुति नहीं कर सकता. कॉपीराइट एक्ट 1957 के सेक्शन 13 के अंतर्गत आपको यह अधिकार प्रदान किया गया है कि आप ऐसे किसी भी प्रयास के विरुद्ध शिकायत दर्ज कर सकें. कॉपीराइट का उल्लंघन करने वाले को दोषी पाए जाने पर इस एक्ट के सेक्शन 63 व 63 ए के अंतर्गत कठोर सजा दिए जाने प्रावधान है जो जेल व जुर्माने के रूप में हो सकती है.
आज जो समय है, उसमें परंपरागत प्रकाशन और टीवी-सिनेमा के अलावा इतने सारे मंच, जैसे कि तरह-तरह के एप्प, वेबसाइट, ओटीटी चैनल आदि, अस्तित्व में आ चुुके हैं, जहाँ आपकी रचना का उपयोग, आपकी अनुमति और जानकारी के बिना ही हो रहा हो. आप आखिर कहाँ-कहाँ नजर रख सकते हैं. इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर आपको पता भी चल जाए तो आप क्या करेंगे? अगर आपने अपनी रचना का कॉपीराइट नहीं कराया है तो आप उनसे शिकायत करते रहिए, ज्यादा संभावना इसी बात की है कि वे उस पर ध्यान ही न दें. लेकिन, अगर आपकी रचना कॉपीराइट के द्वारा लीगली प्रोटेक्टेड है तो आप इस तरह के मामले देखने वाले वकील की सहायता से अपने अधिकारों की माँग करते हुए उल्लंघनकर्ता को लीगल नोटिस भेज सकते हैं. जिसकी अनदेखी उसे भारी पड़ सकती है.
(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता व कॉपीराइट मामलों के जानकार हैं.)

3 thoughts on “कॉपीराइट का राइट एंगल

  1. आपने बिलकुल ठीक लिखा है ।हम लेखक लिखते तो है दिलोजान लगा कर, वर्षों लिखते हैं। खैर अब तो डिजिटल प्लेटफार्म आ गए हैं पहले पेपर पर भी इतनी ही मेहनत से लिखकर ऐसे बिना किसी सुरक्षा के छपने हेतु भेज दिया करते थे पर जब ईमानदारी नाम की कोई शै हुआ करती थी जिसका अब नैतिक पतन हो चुका है। डिजिटल पटल पर लिखने से चोरी के रास्ते अधिक हो गए हैं।
    मैंने कॉपीराइट विभाग से भी बहुत पहले संपर्क किया था तब उन्होंने अच्छी खासी रकम के साथ एक बंडल अँग्रेजी में लिखा हुआ , सारी सैवा शर्तें , प्वाइंट भेज दिए थे। अब उसको पढ़ना भी हर किसी के लिए संभव नहीं स
    है न ही इस कानून को भी मंगवा लें तो हम तामील नहीं कर सकते। हम लिखने वाले लिख ही सकते हैं ।कोई ऐसा अलग विभाग हो ,जहाँ हम सादे से फार्म पर अपनी रचना के कॉपीराइट सुरक्षित कर सकें। फिर हमें तो लिखते ही रहना है। यदि कानूनी प्रक्रिया में उलझेंगे तो लिखना संभव नहीं है। चोरी की सजा भी इतनी बड़ी हो कि कोई चुराने की हिम्मत न करे।

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