बेगुनाह ‘कातिल’

दिनों हिंदी पॉकेट बुक्स के बाजार में नए प्लेयर्स की एंट्री ने अस्थापित लेकिन प्रतिभाशाली लेखकों के लिए काफी अवसर पैदा किए हैं, जिसका फायदा यह है कि पाठकों को लगातार नए—नए विषयों पर किताबें पढ़ने को मिल रही हैं.
जहाँ तक जासूसी साहित्य का सवाल है, इसमें अधिकतर यह देखने में आता है कि ऐसे उपन्यास या तो श्रंखला के रूप में किसी जासूस या पुलिस अधिकारी नायक के तर्कचातुर्य और साहसिक कारनामों के इर्दगिर्द घूमते हुए आगे बढ़ते हैं, या एक ही किताब में खत्म हो जाने वाले थ्रिलर के रूप में.


लेकिन, पत्रकार व लेखक आनंद के. सिंह का उपन्यास हीरोइन की हत्या इस मायने में अलग है कि इसमें नायक यश खांडेकर एक जासूस तो है, लेकिन साथ ही एक हत्या का आरोपी भी है.
आरोपी भी ऐसा, जो अपनी याददाश्त ही खो चुका है. तो जाहिर है कि पाठकों की उत्सुकता शुरू से ही अपने चरम पर पहुँच जाती है कि तमाम दुश्मनों और सख्त मिजाज पुलिस अधिकारी बलदेव नारंग से बचते हुए यश कैसे खुद को बेगुनाह साबित करेगा. कहानी कदम दर कदम आगे बढ़ती है, और एक अप्रत्याशित अंत के साथ समाप्त होती है. जासूसी कहानियों के बारे में ज्यादा बताना अच्छा नहीं माना जाता, क्योंकि इससे पढ़ने वाले और लेखक, दोनों की बददुआएं मिलने का डर रहता है.
कहानी में तीन स्मार्ट युवतियाँ हैं, जो नायक की मदद कर रही हैं. लेकिन नायक को जेम्स बॉन्ड की तरह रंगेलियां मनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है और लेखक ने इस तरह के थोपे हुए रोमांस से बचते हुए कहानी को उसके मूल उद्देश्य पर ही फोकस रखा है.
आनंद के. सिंह की यह पहली ही रचना है, लेकिन उनके लेखन की परिपक्वता और भाषा का सधापन, कहीं इसका आभास नहीं होने देता. उनका कहना है कि इस किताब के उन्होंने एक लेखक नहीं, बल्कि एक पाठक की तरह रचा है, ताकि वह वही प्रस्तुत करें, जो पाठकों को बाँधे रखने में सक्षम हो.

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