मनुष्यों पर भारी मशीनें

इंसान और मशीनों का रिश्ता सैकड़ों साल पुराना है. इंसान मशीनें बनाता है और मशीनें इंसान के काम आती हैं. लेकिन जब इंसान मशीनों को इंसान बनाने लगे और खुद मशीन में बदलता जाए तो किस तरह की स्थिति उत्पन्न होगी, फिलहाल इसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि जो भी होगा वह कम से कम हमारे हित में तो नहीं ही होगा.

आप समझ ही गए होंगे कि यहाँ हम यंत्रमानवों यानी रोबोट्स की बात कर रहे हैं. वे रोबोट्स, जिनकी सर्वप्रथम कल्पना करीब सौ साल पहले, 5 1921 में चेक लेखक कैरेल केपेक ने अपने विज्ञान नाटक ‘आर.यू.आर (रोशुम के युनिवर्सल रोबोट)’ में की थी. इसके बाद रोबोट को लेकर अनेक कहानियां और फिल्में बनीं और आज भी बन रही हैं, जिनमें वे कभी हमदर्द की तरह नजर आते हैं तो कभी सिरदर्द की तरह. विज्ञान फिल्में बनाने वालों के तीन सबसे ज्यादा पसंदीदा टॉपिक्स, टाइम मशीन, स्पेस और रोबोट्स में शामिल रोबोट्स की लोकप्रियता सबसे ज्यादा है, क्योंकि इनके साथ इंसान का रिश्ता द्विपक्षीय होता है अर्थात् ये उसकी बात या व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं.

इस विषय पर बनी फिल्मों में से कई की कहानी आज वास्तविकता के रूप में हमारे सामने है. जो रोबोट्स, एक समय तक विज्ञान फंतासियों के जरिए सिर्फ हमारी कल्पनाओं में प्रवेश कर रहे थे, आज विज्ञान के जरिए हमारे जीवन में तेजी से घुसपैठ कर रहे हैं और हमारे आसपास अपनी-अपनी भूमिकाओं को निभाते देखे जा रहे हैं. सालों से, हर महीने तकरीबन एक दर्जन ऐसी खबरें आ रही हैं, जो रोबोट्स वर्ल्ड में तेजी से हो रही प्रगति और विकास से ताल्लुक रखती हैं.  

कभी हम इन्हें फुटबॉल के मैदान में गोल करते हुए देखते हैं, कभी क्लब में डांस करते हुए, कहीं ये प्यानो बजा रहे हैं तो कहीं गन चला रहे हैं. किसी होटल में खाना पका रहे हैं तो किसी रेस्तरां में ग्राहकों को ऑर्डर सर्व कर रहे हैं, कहीं ये ओटी में ऑपरेशन कर रहे हैं तो कहीं नर्स की तरह मरीजों की तीमारदारी कर रहे हैं, कहीं मशीने चला रहे हैं तो कहीं गन से निशाना साध रहे हैं.
इंसान की अपनी सीमाएं हो सकती हैं, लेकिन रोबोटोक्सि में हो रही तीव्रगामी प्रगति ने साबित कर दिया है कि रोबोटों सारी सीमाएं तोड़ रहे हैं. ये मछलियों की तरह जल में गोते लगा सकते हैं, बंदर की तरह पेड़ और पहाड़ पर चढ़ सकते हैं, पंछियों की तरह आसमान में मंडरा सकते हैं, ये पाताल में उतर सकते हैं, अंधेरे में देख सकते हैं.

बीते महीनों में कोरोना संकट के दौरान कई जगहों पर, कई इनोवेटर्स ने आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है कि तर्ज पर तरह—तरह के रोबोट्स डेवलप किए, जो सेनेटाइजर बांटने, कोरोनो टेस्ट करने, लोगों को मास्क के इस्तेमाल और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन के लिए प्रेरित करने, मास्क न पहनने वालों की पहचान करने, थर्मल स्क्रीनिंग, वार्ड में मरीजों को दवाईयां और खाने—पीने की चीजें पहुंचाने, वार्डों की साफ—सफाई जैसे कामों में काफी मददगार साबित हुए. हालांकि इस तरह के उदाहरण कोरोना के प्रभाव क्षेत्र की व्यापकता को देखते हुए संख्या में काफी लग सकते हैं, लेकिन सोचिए कि ऐसी कोई समस्या आज से दस साल बाद सामने आई तो ये रोबोट किसी वरदान से कम न होंगे. क्योंकि तब तक ये हर जगह फैल चुके होंगे और ऐसी किसी बीमारी से लड़ने में जिन डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों, सफाईकर्मियों, पुलिस के जवानों आदि को अपनी सेहत और जान दांव पर लगानी पड़ती है, उन्हें कितने बड़े पैमाने पर बचाया जा सकेगा.

हॉलीवुड की आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पर बेस्ड 70 करोड़ डॉलर बजट वाली फिल्म ‘बी ‘ में लीड रोल में एक एआई रोबोट को अनुबंधित किया गया है. और इतना ही नहीं, इसे इस फिल्म के लिए सात करोड़ डॉलर की मोटी फीस की ऐवज में अनुबंधित किया गया है, जो कि फिल्म के टोटल बजट की दस फीसदी राशि है. इसकी कहानी के केंद्र में एक साइंटिस्ट है, जो एक पूर्ण मानव डीएनए के लिए अपने ही डेवलप किए प्रोग्राम जुड़े खतरों का पता लगाता है. वह एरिका नाम की एक एआई रोबोट डिजाइन करता है, जो हर तरह के संक्रमण से सुरक्षित है. एरिका रील ही नहीं, बल्कि रीयल लाइफ में भी एक एआई रोबोट है, जिसे जापान के हिरोशी इशिगुरो और कोहेई ओगावा वैज्ञानिकों नाम के दो वैज्ञानिकों द्वारा द्वारा अपने रोबोटिक्स अध्ययन के भाग के रूप में विकसित किया है. उन्होंने एरिका की कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अभिनय के सिद्धांतों को लागू करना सिखाया। फिल्म के एक निर्माता और लेखक सैम खोए ने हॉलीवुड रिपोर्टर को बताया कि अभिनय के अन्य तरीकों में, अभिनेता भूमिका में अपने जीवन के अनुभवों को शामिल करते हैं. मगर, एरिका को जीवन का कोई अनुभव नहीं है। भूमिका निभाने के लिए उसे स्क्रैच से बनाया गया था। हमें एक- एक सत्रों के माध्यम से उसकी गतियों और भावनाओं को उसे सिखाना था, जैसे कि उसकी गतिविधियों की गति को नियंत्रित करना, उसकी भावनाओं और चरित्र के विकास के साथ ही बॉडी लैंग्वेज के जरिये बात करना.बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में नैनो प्रौद्योगिकी और इस सदी के मौजूदा वक्त में ए.आई. यानी आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस के बढ़ते प्रचलन और प्रभाव ने रोबोटिक्स की दुनिया में एक जबर्दस्त बदलाव का सूत्रपात किया है और वैज्ञानिक ऐसे रोबोट बनाने में सफल हो रहे हैं, जो बुद्धि, चातुर्य और शारीरिक दक्षता के मामले में एक औसत इंसान से थोडा ही पीछे कहे जा सकते हैं. आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस की मदद से आज ऐसे रोबोट तक डेवलप किए जा चुके हैं, जो शारीरिक कौशल ही नहीं, बल्कि ऐसे कामों को करने में भी इंसानों से होड़ कर रहे हैं, जिनमें बुद्धि और विवेक की आवश्यकता होती है.

ये रोबोट वे रोबोट हैं, जो अदालतों में वकील बनकर जिरह कर सकते हैं, जज बनकर फैसले सुना सकते हैं, सड़क पर खड़े होकर यातायात व्यवस्था की कमान संभाल सकते हैं, न्यूज रूम में बैठकर खबरें रचने से लेकर खबरें पढ़ने तक एडिटर-कम-एंकर की भूमिका निभा सकते हैं, कविताएं रचकर वाहवाही लूट सकते हैं, स्टेज पर एक्टिंग कर सकते हैं और सिंगर की तरह गाने गा सकते हैं. ये महूसस कर सकते हैं ओर महसूस किए जा सकते हैं. और तो और अब ऐसे रोबोट्स भी बनाए जा रहे हैं, जो हमारे लिए एक एक्टिव और रिस्पॉन्सिव सेक्स पार्टनर के तौर पर काम कर सकते हैं.

अपनी भावनाओं को महसूस करने और अभिव्यक्त करने में सक्षम रोबोट्स ऐसेे रोबोट्स इंसानों के बीच इस तरह घुलमिल चुके हैं कि जल्दी से इनकी वास्तविकता को जान पाना आसान नहीं रह गया है. अब इनकी चाल की लड़खड़ाहट या बोलने की भिनभिनाहट अतीत की बात बन चुकी है. आज ये हमारी तरह दिखते-बोलते ही नहीं, बल्कि हमारी तरह सोचते भी हैं. ये सिर्फ मेटल, फाइबर और सिंथेटिक से बनी एक मानवीय आकृति भर नहीं हैं. इनके पास कृत्रिम चेतना है, विवेक है, बुद्धि है…

दुनिया में ऐसे रोबोट्स की तादाद लगातार बढ़ रही है, इसी के साथ-साथ, धीरे-धीरे ही सही,  इंसानों के बीच इनकी स्वीकार्यता भी इसी तेजी में बढ़ रही है. युवक-युवतियां और एकाकी बुजुर्ग रोबोट गर्ल या रोबाट बॉय से शादियाँ कर चुके हैं या इसकी फिराक में हैं. कुछ देशों में तो इन शादियों को मान्यता देने पर भी विचार किया जा रहा है. मुमकिन है कि आने वाले सालों में कई देशों द्वारा उदारता दिखाई जाए और दुनिया के ओल्डेस्ट प्रोफेशन में भी इनकी जबर्दस्त उपस्थिति दर्ज की जाने लगे. इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे ह्यूमैन ट्रैफिकिंग और संक्रमण से फैलने वाले यौन रोगों की समस्या को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी.

समाज में इनकी अहमियत और जरूरत लगातार बढ़ रही है. सऊदी अरब ने सोफिया नाम की एक रोबोट को अपने देश की नागरिकता देकर एक शुरुआत कर दी है. जिसका अनुसरण दूसरे देश भी करते नजर आएं तो कोई आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए. कई सालों से रोबोट्स के अधिकारों को लेकर एक वैश्विक संस्था के गठन पर विचार चल ही रहा है. अगर यह संस्था अस्तित्व में आई तो रोबोट भी अपने अधिकारों की आवाज उठा सकेंगे.

अगर आज कोई यह कहे कि हमारे बीच ऐसे बहुत से लोग मौजूद हैं जो इंसान हैं ही नहीं, बल्कि इंसानों जैसे दिखने वाले और इंसानों की तरह व्यवहार करने वाले रोबोट्स हैं तो शायद इसे मजाक या ऐसा कहने वाले को पागल समझा जाएगा, लेकिन दस साल बाद शायद यह एक मजाक न हो. क्योंकि आज आकाश, अंतरिक्ष, धरती, समंदर…ये हर जगह मौजूद हैं. एक ओर तो इन्हें इंसानों का एक बेहतरीन विकल्प माना जा रहा है, वहीं ये भी चिंता व्यक्त की जाने लगी हैं कि क्या इनकी बढ़ती मौजूदगी हमारे लिए किसी खतरे की घंटी तो नहीं? हर साल रोबोटिक्स के जरिए अपनाए जा रहे ऑटोमेशन की वजह से हजारों नौकरियां जाने की खबरें आना शुरू हो गई हैं. समाजशास्त्री और अर्थशास्त्री इस स्थिति के और भी भयावह होने की चेतावनियां देने लगे हैं. वहीं निजी जीवन में इनकी घुसपैठ को लेकर भी तरह-तरह की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं.

ये आशंकाएं तब भी बढ़ती हैं, जब हम अपने दादा-दादी, माता-पिता से लेकर छोटे-छोटे बच्चों तक का ख्याल रखने के लिए रोबोट सेवक नियुक्त करने की सोचते हैं. भले ही ऐसे रोबोट के समर्थक तर्क दें कि ऐसे दौर में, जब हम अपनी व्यस्तता और भागादौड़ी भरी जिंदगी के बीच चाहकर भी अपने परिवार के वृद्धों – बुजुर्गो और बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं, इस तरह के रोबोट एक वरदान साबित होंगे. लेकिन विरोधियों को यह तर्क गले नहीं उतर रहा है.
उनका कहना है कि ऐसे रोबोट का घर में होना, हमें अपने दायित्वों के प्रति और अधिक गैरजिम्मेदार तथा बेपरवाह बनाएगा. और अगर ऐसा न भी हो, तब भी एक मशीनी ढांचा कितनी ही कोशिश क्यों न कर ले, वह ऊष्मा नहीं जगा सकता, जो कि एक मनुष्य के अपनत्व भरे स्पर्श और उसके पास होने के एहसास से उत्पन्न होती है.

आदर्श स्थिति भी यही है कि मशीन को मशीन का काम ही करने दिया जाए और इंसान का काम इंसान ही करे. लेकिन, हो उल्टा रहा है. हम खुद तो मशीन बनते जा रहे हैं, मगर मशीनों को इंसान में बदलने की हमारी कोशिशें बढ रही हैं. क्या यह बेहतर नहीं कि हम खुद को ही एक इंसान बनाने के बारे में सोचें?


‘आई, रोबोट’ के लिए प्रसिद्ध एक और विज्ञान कथा लेखक इसाक असिमोव ने 1942 में प्रकाशित अपनी रचना ‘रनअराउंड’ मे पहली बार रोबोट के लिए तीन मौलिक कानून निर्धारित किए, जिनके अनुसार कोई रोबोट जानबूझकर या अनजाने में किसी मनुष्य को नुकसान नहीं पहुंचा सकता था. रोबोटिक्स के ये तीन नियम हैं: 1) एक रोबोट मनुष्य को नुकसान नहीं पहुंचा सकता और न ही जानबूझकर किसी को ऐसा करने दे सकता है. 2) एक रोबोट को मनुष्य के दिए आदेशों का पालन करना है, बशर्ते कि इससे पहले नियम का उल्लंघन न होता हो. 3) एक रोबोट को अपनी सुरक्षा करनी चाहिए, बशर्ते कि ऐसा करते हुए पहले एवं दूसरे नियम का उल्लंघन न होता हो.
लेकिन, यह हमेशा ही जरूरी नहीं कि ये वही करें जो हम इनसे करवाना चाहते हैं. ये अपनी मर्जी से भी कुछ ऐसा कर सकते हैं, जो आपको चौंका दे. ऐसी अनेक चौंका देने वाली खबरें सामने आई हैं, जिनमें रोबोट ने कहीं आत्महत्या की है, कहीं हत्या की है, कहीं किसी की जान बचाई है… और जाँच में यह पाया गया है कि उन्हें ऐसा करने के लिए निर्देशित नहीं किया गया था या तकनकी भाषा में यूं कह सकते हैं कि इन रोबोट्स ने जिन कामों को अंजाम दिया, जो उनके लिए निर्धारित निर्देशों ( प्रोग्राम्ड इंस्ट्रक्शंस) में शामिल नहीं थे. इससे पता चलता है कि ये नियम सिर्फ किताबी हैं, वास्तविक दुनिया में रोबोट्स अपनी मर्जी से भी कुछ भी कदम उठा सकते हैं या उन्हें हैक करके उनसे ऐसे काम करवाए जा सकते हैं जो उनके डेवलपर ने उन्हें बनाते समय उनके लिए निर्धारित नहीं किए होंगे. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि अगर रोबोट की किसी गतिविधि की वजह से किसी इंसान को कोई नुकसान पहुंचता है तो इसके लिए किसे अपराधी माना जाएगा. अगर हम रोबोट के अधिकारों को सुनिश्चित और सुरक्षित करने के लिए वैश्विक आयोग बनाने की वकालत कर रहे हैं तो क्या हम उनकी जवाबदेही तय नहीं करेंगे?

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