मुश्किलों के मुसाफिर

कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जिनके बारे में कुछ कहना सूरज को चिराग दिखाने जैसा होता है. जूल्स वर्न की जर्नी टू द सेंटर आॅफ द अर्थ ऐसी ही एक किताब है. इसका हिंदी अनुवाद फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस ने प्रकाशित किया है. जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, यह एक यात्रा कथा है. लेकिन, सामान्य यात्रा कथाओं से एकदम अलग, जिनमें पता होता है कि कहाँ, क्या और कैसे करना है. योजना और तैयारियाँ तो इसमें भी है, लेकिन अगले कदम पर क्या होने वाला है, इसका कतई अंदाजा नहीं है. न सफर करने वालों को, न इसका ब्यौरा पढ़ने वालों को. इसलिए अंत तक रहस्य बरकरार रहता है और रोमांच भी.

सोए हुए ज्वालामुखी के रास्ते भीतर प्रवेश करने से जाग उठे ज्वालामुखी के साथ बाहर आने तक के इस सफर में एक ऐसे दौर की कहानी है, जहाँ कुदरत के करिश्मे हैं, विशालकाय जीव-जंतु हैं, पेड़ हैं, कुकुरमुत्तों के जंगल हैं. चुनौतियाँ हैं, उनसे जूझते हुए उन पर विजय पाने का जुनून है, तकलीफें हैं, उम्मीदें हैं, निराशा है, उत्साह है और भाग्य का साथ है, जो उन्हें हर मुश्किल से बाहर निकाल ही लाता है.

मामा-भाँजा, चाचा-भतीजा की जोड़ी आपने बहुत सारी किताबों और फिल्मों में देखी होगी, लेकिन इसमें आपको एक मौसा प्रोफेसर हार्डविग और उनके भाँजे हैरी, जो उनकी बेटी का प्रेमी भी है, के रोमांचक कारनामों की कहानी है. किताब में एक किरदार हैंस का है, जो कहने को तो इस खतरनाक सफर में उनका गाइड है, लेकिन कई बार अपने अनुभव और साहस के बूते उनका जीवन रक्षक बन जाता है.

इस पुस्तक का अनुवाद इतना शानदार है कि कहीं लगता ही नहीं कि हम एक अनुदित कृति पढ़ रहे हैं. भाषा सरस है और प्रवाहमय भी. जैसे कि अंकल हार्डविग का परिचय कराते हुए भाँजा कहता है कि कोई उनके पास ज्ञान के लोटे से मुँह धोने के लिए आता था तो वह उसे उठाकर ज्ञान के समंदर में फेंक देते थे. वह जैसे-तैसे अपनी जान बचाकर निकलता था तो फिर जीवन में कभी उनके सामने नहीं आता था.

पुस्तक में अनेक स्थान पर ऐसी चुटीली उपमाएं और संवाद हैं, जो मुश्किल विषय होते हुए भी इसे कहीं बोझिल नहीं होने देते. इस बेहतरीन अनुवाद के लिए अनुवादक आलोक कुमार बधाई के हकदार हैं.पुस्तक में मूल कृति के चित्रांकन को भी शामिल किया गया है, जो डेढ़ सौ साल पहले की कला से परिचित होने का मौका देते हैं. इस किताब को पढ़ना अगर खुशी देता है तो संग्रह में शामिल करना गर्व का बोध कराता है. Click here to buy

—संदीप अग्रवाल

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