रात को रात ही रहने दो…

कभी किसी जंगल या विकास की प्रचलित परिभाषा के अनुसार पिछड़े इलाके में रात के वक्त आसमान को देखा है? स्याह नीला आसमान, उस पर टिमटिमाते, थरथराते सितारे, सुनहरी लालिमा लिए मंगल, चाँदी से भी चमकीला बुध, उजला कभी आधा—अधूरा तो कभी पूरा चाँद, पल—पल में दिखते—ओझल होते रोशनी के नन्हें निशान, किसी पेड़ पर हजारों की तादाद में फूलों जैसे लदे जुगनू…पूरा आकाश एक सम्मोहक कलाकृति जैसा नजर आता है, जिसे जितना भी देखते जाओ, मन ही नहीं भरता.

इसे याद कीजिए और आज रात अपनी बिल्डिंग की छत पर जाकर आसमान की ओर देखिए, क्या नजर आता है? रोशनी की एक पीली सी धुंध की चादर, जिसके पीछे सब कुछ अदृश्य हो जाता है. न आकाश की नीलिमा नजर आती है, न चाँदनी की धवलता.

यह कोई कविता नहीं है, बल्कि एक ऐसी समस्या है, जिस पर हमारे यहाँ कभी कोई चर्चा नहीं होती. या तो हमें चाँद, तारे या आसमान के दिखने न दिखने से कोई फर्क नहीं पड़ता, या फिर हमें अंधकार को लगातार हमसे दूर कर रहे प्रकाश के प्रति कुछ ज्यादा ही जुनून है.

दुनिया भर में अलग-अलग स्तरों पर ज्यादा से ज्यादा रोशनी का इंतजाम करने की कवायदें जारी हैं. कहीं नकली सूरज बनाने की तैयारी चल रही है, कहीं आईने लगाकर उसकी रोशनी की अवधि को लंबा किया जा रहा है. ज्यादा से ज्यादा शहर खुद को ‘सिटी, दैट नेवर स्लीप’ बनाने की तैयारी में लगे हैं. कोरोना के कहर से पहले तक कई जगह स्थानीय सरकारें माॅल, होटलों आदि को चौबीसो घंटे खुला रखने की इजाजत दे चुकी थीं.

प्रकाश को लेकर हमारा यही जुनून प्रकाश प्रदूषण का कारण है. प्रकाश प्रदूषण, जिसे फोटो पॉल्यूशन भी कहा जाता है, इंसानी दखल की वजह से होने वाली रोशनियों और कृत्रिम प्रकाश का वह अतिरेक है, जो रात के वातावरण को प्रदूषित कर रहा है.

हम जल प्रदूषण को लेकर चिंतित रहते हैं, वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण में कमी लाने को लेकर प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हैं, लेकिन प्रकाश प्रदूषण का हमारी ज़िंदगी पर क्या असर पड़ने वाला है, इसके बारे में आपको किसी से कहीं कुछ सुनने को नहीं मिलेगा.

इसके विपरीत लोग ज्यादा से ज्यादा जागना चाहते हैं, क्योंकि सोना उनकी नजरों में समय की बर्बादी है. इसलिए वे अंधेरे के खिलाफ रोशनियों की मात्रा लगातार बढ़ाते जा रहे हैं. ज्यादा से ज्यादा रोशनी देने वाले उपकरण बनाए जा रहे हैं.

जबकि वास्तविकता यह है कि वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण की तरह, यह भी एक ऐसा प्रदूषण है, जिसके बारे में गंभीरता से सोचने का वक्त आ गया है. रोशनी जरूरी है, क्योंकि यह सकारात्मकता की प्रतीक है और उस अंधेरे को दूर करती है, जिसे हमेशा से भय और पाप को जन्म देने वाला माना गया है. लेकिन, कभी आपने कल्पना की है कि अंधेरा न हो तो क्या होगा?

अंधेरा हमारी ज़िंदगी से किस तरह कम हो रहा है, इसका अंदाजा बरसात के मौसम में किसी भी रात को अपने घर की छत पर जाकर देख लीजिए. धरती पर फैली रोशनी की वजह से अब आप सुरमे से भी काले मेघ दल को नंगी आंखों से भी देख लेते हैं, जो कुछ साल पहले बहुत मुश्किल हुआ करता था, वहीं इसी आसमान में जगमगाने वाले तारों को देखने के लिए, खोजने के लिए आपको बहुत जोर डालना पड़ता है, क्योंकि आसमान बेइंतहा रोशनी की वजह से धुंधलाता जा रहा है.

अगर आपने पुरानी क्राइम मूवीज देखी हैं तो आपको एक आम सा सीन याद आ जाएगा जब पुलिस के पूछताछ कक्ष में आरोपी को यंत्रणा देने के लिए उसकी कुर्सी के ऐन ऊपर एक तेज रोशनी वाला बल्ब लगा दिया जाता था, जिसकी वजह से वह नींद को तरस जाता था और अपने घुटने टेक देता था. यह यंत्रणा अब आम जीवन में प्रवेश कर चुकी है. लगातार रोशन रहने वाली रातें हमसे हमारी नींद छीन रही हैं और मन का सुकून भी.

उद्योगोन्मुखी सभ्यता के अनेक दुष्परिणामों में से एक प्रकाश प्रदूषण भी है.प्रकाश प्रदूषण के सबसे बड़े दोषी स्रोत हैं, घरों में इस्तेमाल ऐसी रोशनियां जो बालकनी, टेरेस या कम्पाउंड वॉल पर लगाई जाती हैं, स्ट्रीट लाइटों में इस्तेमाल होने वाले फ्लड लाइट बल्ब, मल्टीप्लेक्स और शॉपिंग मॉल, उन पर लगे विशालकाय नियोन साइनबोर्ड और होर्डिंग्स… इनकी वजह से वातावरण मे इतना ज्यादा प्रकाश छितरा जाता है, जो लाइट फॉग की स्थिति उत्पन्न कर देता है. सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था का प्रकाश प्रदूषण में एक बड़ा योगदान है.

कुछ विशेषज्ञ रात को लगातार निकलने वाली आसमान की चमक, सुदूर सितारों से आने वाली रोशनी,  प्राकृतिक गैसों और चमकदार पदार्थों से स्फुरित होने वाली धुंधली रोशनी को भी प्रकाश प्रदूषण बढ़ाने के लिए जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन इस बात में इसलिए कोई विश्वसनीयता नहीं है कि अगर ऐसा होता तो निर्जन क्षेत्रों में भी प्रकाश प्रदूषण की समस्या महसूस की जाती. प्रकाश प्रदूषण का आरंभ उस रोशनी से होता है जो धरती से आसमान की ओर बढ़ती है और रास्ते में गैस, धूल—मिट्टी व कुहासे के कणों से मिलकर वातावरण में फैलती जाती है और धुंध की एक विशाल चादर निर्मित कर देती है.

यह धुंध बहुत सारी मानवीय व प्राकृतिक खगोल गतिविधियों में बाधक बनती है. खगोलविदों को आकाश के अध्ययन में इसकी वजह से काफी कठिनाई अनुभव होती है. क्योंकि इस चमक की वजह से बहुत सारे ग्रह—नक्षत्र उनकी दूरबीनों की पकड़ में नहीं आ पाते. इसके अलावा इस धुंध का मनुष्य व अन्य जीवों की देखने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है, जो लगातार कमजोर होती चली जाती है. लगातार रोशनी में रहने की वजह से अनिद्रा, तनाव व थकान आदि की वजह से उनका चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है और उनके स्वभाव में उग्रता आती है.  कार्यस्थलों पर कृत्रिम प्रकाश से रक्तचाप में आठ अंकों तक की वृद्धि हो सकती है. प्रकाश का अतिरेक कई जीवों, खासकर रात के समय जागने वाले प्राणी, की प्रजनन क्षमता को भी कम करता है.यहाँ तक कि प्रकाश प्रदूषण का पेड़—पौधों और वनस्पतियों पर भी काफी नकारात्मक असर होता है, क्योंकि हमारी तरह उन्हें भी एक सही अनुपात में रोशनी और अंधेरे की जरूरत होती है. यह हर उस प्राणी और चीज की जैविक घड़ी को बिगाड़ देता है, जिसमें वह होती है. इसके अलावा इतनी ज्यादा रोशनी से तापमान में जो वृद्धि होती है, उसके दुष्परिणाम अपनी जगह हैं ही.

विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि प्रकाश प्रदूषण की वजह से कुछ स्थानों पर आसमान की चमक 5 से 10 गुना अधिक पाई गई  तो कुछ जगहों पर यह 50 गुना तक पहुँच गई. एक अनुमान के मुताबिक प्रकाश प्रदूषण के एक बड़े स्रोत, जैसे कि कोई महानगर, की वजह से होने वाले प्रकाश प्रदूषण का प्रभाव क्षेत्र सौ किमी तक हो सकता है. जब हम दिन में आसमान को देखते हैं तो सूरज के प्रकाश की वजह से हमारी आँखें चौंधियाने लगती हैं. लेकिन प्रकाश प्रदूषण के कारण धीरे—धीरे हम रात में भी इसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं.

जिस समय कुदरत ने सृष्टि की रचना की, उसने प्रकाश और अंधकार का अनुपात बहुत संतुलित रखा था. लेकिन धीरे—धीरे अंधकार से डरने और उसे बुरा मानने की हमारी प्रवृत्ति ने हमें उकसाया कि हम अंधेरे को दूर करने के तरीके खोजें. दीपक, ढिबरी, मोमबत्ती, लालटेन, फिलामेंट बल्ब तक तो गनीमत थी, लेकिन प्रकाश व्यवस्था में एलईडी  होलोजोन रोशनियों के प्रवेश ने हमें रोशनी का ऐसा एडिक्ट बना दिया कि हम जीवन का कोई भी हिस्सा इसके बिना जीना नहीं चाहते. हमारे इस प्रकाश मोह के चलते हो सकता है कि कुछ साल बाद हम अंधेरे के लिए इतना तरस जाएं कि हमें अंधेरा करने वाले उपकरण इजाद करने पड़ें… ठीक वैसे ही जैसे बीती सदियों में हमने अंधेरे से छुटकारा पाने के लिए किए थे.

लाइट के एडिक्ट हममें से बहुत कम लोग जानते हैं कि अस्सी के दशक से दुनिया में प्रकाश प्रदूषण के खिलाफ एक वैश्विक मुहिम चल रही है, जिसका नाम है डार्क स्काई मूवमेंट. इसके कार्यकर्ता लोगों को प्रकाश प्रदूषण के खतरों के प्रति आगाह करते हैं और उन्हें प्रेरित करते हैं कि वे रोशनी का उपयोग जरूरत पड़ने पर ही करें और बताते हैं कि वे किस तरह अपने प्रकाशीय उपभोग को विवेकपूर्ण बना सकते हैं. विकीपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस अंतरराष्ट्रीय डार्क स्काई एसोसिएशन ने आदर्श प्रकाश व्यवस्था नियमों को विकसित किया है. ताकि आकाश में ऊपर जाने वाले प्रकाश को, जिससे सितारों की दृश्यता कम हो जाती है कम किया जा सके.

इस विषय पर कई अच्छी फिल्मों और डॉक्यूमेंट्रियों का निर्माण हुआ है. सेविंग द डार्क इन्हीं में से एक है. एस्ट्रोनॉमी और प्रकाश प्रदूषण पर बनी यह डॉक्यूमेंट्री हमें रात के आकाश की अहमियत, खगोल अध्ययन, मानव स्वास्थ्य, वाइल्ड लाइफ पर प्रकाश प्रदूषण के प्रभाव और इससे लड़ने के लिए हम क्या कर सकते हैं, जैसी बातों से परिचित कराती है. इस डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया है कि प्रकाश प्रदूषण सेहत, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण को किस तरह प्रभावित कर रहा है और अंधेरे रात्रि आकाश को बचाने के लिए विभिन्न संस्थाएं क्या—क्या कर रही हैं और आम लोग अपने घरों में रहते हुए इस समस्या को कम करने के लिए क्या—क्या कर सकते हैं.

इस विषय पर कई अच्छी फिल्मों और डॉक्यूमेंट्रियों का निर्माण हुआ है. इन्हीं में से एक है, द सिटी डार्क, जिसकी टैगलाइन है एक कभी न सोने वाले ग्रह पर रात की खोज. यह प्रकाश प्रदूषण की वजह से गुम होते जा रहे सितारों की कहानी कहती है. और एक ऐसे फिल्मकार की नजरों से दुनिया की तस्वीर पेश करती है, जो एक महानगर में आकर देखता है कि किस तरह प्रकाश की भरमार की वजह से आसमान में सितारे नजर आने बंद हो गए हैं और इस यक्ष प्रश्न का उत्तर पाने की कोशिश करता है कि अगर हमने रातों को खो दिया तो हमें क्या—क्या खोना पड़ेगा.  ऐसी ही एक और उल्लेखनीय डॉक्यूमेंट्री सेविंग द डार्क भी है. एस्ट्रोनॉमी और प्रकाश प्रदूषण पर बनी यह डॉक्यूमेंट्री हमें रात के आकाश की अहमियत, खगोल अध्ययन, मानव स्वास्थ्य, वाइल्ड लाइफ पर प्रकाश प्रदूषण के प्रभाव और इससे लड़ने के लिए हम क्या कर सकते हैं, जैसी बातों से परिचित कराती है. इस डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया है कि प्रकाश प्रदूषण सेहत, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण को किस तरह प्रभावित कर रहा है और अंधेरे रात्रि आकाश को बचाने के लिए विभिन्न संस्थाएं क्या—क्या कर रही हैं और आम लोग अपने घरों में रहते हुए इस समस्या को कम करने के लिए क्या—क्या कर सकते हैं.

कहने का सार यह है कि अंधेरा हमारे लिए रोशनी जितना तो नहीं, फिर भी बहुत ज्यादा जरूरी है. सारी रोशनियां बंद कर आप अंधेरे से मिलने वाली राहत को महसूस कर सकते हैं. अगर अंधेरा नहीं रहा तो आप सो भी न पाएंगे. जरूरत से ज्यादा रोशनी सिर्फ हमारी आंखों को हो नहीं, त्वचा पर भी बुरा असर डालेगी. प्रकृति और जैवविविधता पर इसका जो असर पड़ेगा, वह अलग.

इसलिए अपने रोशनी की जरूरतों को सीमित कीजिए. जहाँ जरूरत न हो रोशनी मत कीजिए और जहाँ जरूरी हो वहाँ भी उतनी ही तीव्रता वाला प्रकाश इस्तेमाल कीजिए, जितने में आपका काम चल सकता है.

रात को रात ही रहने दीजिए. उसे दिन में बदलने की कोशिश मत कीजिए. वर्ना हर दम की रोशनी हमें कहीं का न छोड़ेगी.

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