सिनेमा की पाठशाला

नेशनल सिनेमा डे (23 सितंबर) स्पेशल

एक लंबे समय तक, करोडपति फिल्म क्लब के चलन से पहले तक, सिनेमा को उसके सामाजिक संदर्भों के लिहाज से, बहुत संजीदगी से लिया जाता रहा है. समाज ने कभी सिनेमा से बहुत उम्मीद की है कि वह अपनी व्यापक पहुँच और प्रभावोत्पादकता के बल पर देश, समाज और लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में अपना योगदान देगा और ऐसी फिल्मों से दूर रहेगा, जो युवा पीढ़ी को भ्रष्ट करें या लोगों की सोच को विकृत करे. अब बेशक लोगों को फिल्मों से मनोरंजन के अलावा और कोई अपेक्षा नहीं है, लेकिन यह वह दौर था, जब फिल्मकारों के सामने व्यावसायिक हित तो होते ही थे, पर इसके साथ-साथ उनमें कहीं न कहीं सिनेमा के माध्यम से एक बेहतर समाज के लिए कुछ करने की प्यास और दबाव भी रहता था. ऐसा नहीं कि अब वह प्यास बुझ चुकी है, लेकिन सामाजिक दबाव कम होने से अब उनकी प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं. फिर भी, हर दौर में कुछ न कुछ ऐसी फिल्में आ ही जाती हैं, जो व्यावसायिकता और सरोकारों के बीच एक सफल संतुलन स्थापित करते हुए हमें झकझोरती हैं, कुछ संदेश देती हैं, कुछ अलग सोचने-करने की प्रेरणा देती हैं. यहाँ हम याद करेंगे, इन दोनों कसौटियों पर खरी उतरने वाली ऐसी ही कुछ चुनिंदा फिल्मों को, जो बाॅक्स आॅफिस के साथ-साथ दर्शकों के दिलों पर राज करने में कामयाब रही हैं और हमें जीने के लिए, दुनिया के साथ पेश आने का सही ढंग दिखाने की कोशिश की है…

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सबसे पहले हम बात करते हैं, 1957 में आई दो आँखें बारह हाथ की… समाज सुधार में विश्वास जगाती इस फ़िल्म का संदेश है कि कोई भी जन्म से अपराधी नहीं होता और यदि उसे मौका दिया जाए तो वह बदल सकता है, यह संदेश देने वाली इस फिल्म की कहानी प्रगतिशील विचारों वाले एक युवा जेल वार्डन आदिनाथ की थी, जो अपनी गारंटी पर छह खूंख्वार अपराधियों को, जो कत्ल के अपराध में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं, पैरोल पर रिहा कराता है और उन्हें एक निर्जन स्थान पर ले जाकर बंजर जमीन पर खेती करने की प्रेरणा और मार्गदर्शन देता है. कुछ चुनौतियों और बाधाओं के बाद उनकी कड़ी मेहनत रंग लाती है और आदिनाथ की भी, जब एक नई फसल तैयार होती है और वे सब एक नए इंसान में बदल जाते हैं. इसके निर्देशक हैं वी. शांताराम .

जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं, इस सारगर्भित संदेश के साथ 1971 में प्रदर्शित फिल्म आनंद हमें मौत के भय से मुक्ति का संदेश देती है और बताती है कि मौत अपरिहार्य है. अगर हम जान भी जाएं कि यह तेजी से हमारी ओर बढ़ रही है तो हमें इसके डर से जीना नहीं छोड़ देना चाहिए. नायक आनंद को मालूम है कि वह जिस लाइलाज बीमारी का शिकार है, उसका सफर मौत की मंजिल पर पहुँचकर ही खत्म होना है, लेकिन उसे कोई चिंता नहीं. वह अपने इर्दगिर्द हर समय-हर जगह सिर्फ खुशियां फैलाने में लगा रहता है और अपने व्यवहार से बहुत से लोगों की जिंदगी में बदलाव लाता है. फ़िल्म के निर्देशक हैं हृषिकेश मुखर्जी.

साम्प्रदायिक सद्भाव के मामले में एक बेहतरीन फ़िल्म है महेश भट्ट की जख्म. 1988 में आई इस मूवी का संदेश। है कि
इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता, यह कहना है जख्म का. अजय एक मुस्लिम माता और हिंदू पिता की संतान है. सहअस्तित्व की भावना में उसका दृढ़ विश्वास है, जो तब भी नहीं डगमगाता जब उसकी माँ साम्प्रदायिक दंगों की आग में जल जाती है. तब भी नहीं, जब ऐसे मौकों पर अपनी रोटियां सेंकने वाले तत्व उसे बदला लेने के भड़काते हैं और तब भी नहीं, जब उसकी गर्भवती पत्नी उस पर देश छोड़कर इंगलैंड में सेटल होने के लिए दबाव डालती है, ताकि उनके बच्चे को इस हिंसक माहौल में जन्म न लेना पड़े. (

पारिवारिक मूल्यों में आस्था जगाने वाली 1999 की फिल्म हम दिल दे चुके सनम एक प्रेम त्रिकोण है, जो नंदिनी, उसके पति वनराज और विवाहपूर्व प्रेमी समीर, जिसने उसे प्रेम का मतलब समझाया है, के रिश्तों की संवेदनशीलता और परिपक्वता को पारिभाषित करता है. विवाह के कुछ दिनों बाद वनराज को समीर के बारे में पता चलता है और वह समीर की तलाश में अपनी पत्नी की मदद करता है. इटली जाकर उनकी खोज पूरी होती है और जब नंदिनी को समीर मिलता है तो उसे अहसास होता है कि वह जो कर रही है, वो गलत है और वह अपने निःस्वार्थ पति के पास वापस लौट आती है. इसके निर्देशक हैं संजय लीला भंसाली.

2001 की लगान हमें सफल नेतृत्व के सूत्र सिखाती है. विक्टोरियाई दौर के भारतीय परिवेश की यह काल्पनिक कथा हमें बताती है कि अगर हमारे पास नेतृत्व की क्षमता और एक विश्वसनीय टीम है तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है. यह हमें पूरी टीम को साथ लेकर चलने के फायदों के बारे में भी शिक्षित करती है और बताती है कि टीम की हर इकाई महत्वपूर्ण है, बशर्ते उसे खुद को साबित करने का मौका मिले. कहानी का नायक एक ग्रामीण युवक भुवन है, जो लगान माफ कराने के लिए अंग्रेजों से क्रिकेट मैच जीतने की शर्त लगाने का जोखिम उठाता है और दूसरे गांव वालों की सहायता से इस असंभवप्रायः लक्ष्य को प्राप्त करता है. इसके निर्देशक आशुतोष गोवारीकर हैं.

आशुतोष गोवारीकर की ही एक और फ़िल्म है स्वदेश. 2004 में प्रदर्शित यह फ़िल्म हमें अपने देश से प्यार करने की सीख देती है और बताती है कि हम जो भी हैं, इस देश की बदौलत हैं, इसके लोगों की बदौलत हैं, जिनके प्रति हमें अपनी जिम्मेदारी को कभी नहीं भूलना चाहिए. यह संदेश देती स्वदेश कहानी है मोहन भार्गव नामक एक इंजीनियर की जो नासा के साथ काम करता है और बारह साल बाद अपनी नानी से मिलने उनके गांव आता है. इस गांव में बिजली नहीं है, यह बात उसे झकझोर देती है और वह अपनी दक्षता से गांव के लोगों के जीवन में बिजली के रूप में रोशनी लेकर आता है और हमेशा के लिए अपने देश में ही रहने का फैसला करता है, ताकि अपने लोगों के काम आ सके. (

2006 में प्रदर्शित लगे रहो मुन्नाभाई गाँधीजी की चिरप्रासंगिकता को सामने रखती है. गाँधी जी के दर्शन को एकदम अनूठे और हल्के-फुल्के अंदाज में आम आदमी से जोड़ने वाली इस फिल्म में एक गुंडे मुन्ना भाई की कहानी थी, जिसकी मुलाकात गाँधीजी से जुड़ी एक प्रतियोगिता जीतने के चक्कर में उनकी आत्मा से हो जाती है. वह गाँधीजी की शिक्षाओं को अपनाता है और उनके सच्चे शिष्य की तरह उनके आदर्शों का अनुसरण शुरू कर देता है. वह एक चालाक बिजनेसमैन लकी सिंह के कुत्सित इरादों के खिलाफ खड़ा होता है और सत्याग्रह, अहिंसा, सत्य के मार्ग पर चलते हुए जीत हासिल करता है. इसके निर्देशक हैं राजकुमार हिरानी.

2007 में आई चक दे इंडिया का मूल है टीम भावना. यह बताती है कि अगर आप एक टीम के तौर पर व्यवहार करते हैं तो आप अपराजेय हैं. ‘चक दे…’ एक नगण्य समझी जा रही महिला हाॅकी टीम की कहानी है, जो बाहर से तरह-तरह के विरोध की शिकार है और भीतर से तरह-तरह के भावनात्मक, सांस्कृतिक और निजी अंतर्विरोधों की. इस टीम को कहीं से कोई प्रोत्साहन तो है ही नहीं, और ऊपर से इसके अधिकतर सदस्यों की भी एक-दूसरे से नहीं पटती. इसके बावजूद, जब समय आता है तो वे इस सब से उबरकर एकजुट होते हैं और प्रति़द्वंद्वी टीमों को हराकर हाॅकी का विश्वकप जीतते हैं. इसका निर्देशन शिमित अमीन ने किया है.

हर बच्चा कुछ खास है, इस आदर्श वाक्य को लेकर चलने वाली 2007 की फिल्म तारे जमीन पर सभी अभिभावकों के लिए एक संदेश छोड़ती है कि हमारे बच्चे हमारे सपनों और महत्वाकांक्षाओं का बोछ ढोने के लिए नहीं हैं. अगर हम उन पर इन्हें पूरा करने का दबाव डालते हैं तो हम उनके साथ अन्याय करते हैं. रामशंकर निकुम्भ नाम के एक प्रयोगवादी शिक्षक, जो बच्चों से पहले उनके पालकों को शिक्षित करना ज्यादा जरूरी मानता है, के माध्यम से कही गई इस कहानी में यही समझाया गया है कि बच्चों की परवरिश और शिक्षा उनकी व्यक्तिगत संभावनाओं और खूबियों के आधार पर होनी चाहिए. आमिर खान ही ने इसका निर्देशन भी किया था.

2009 में आई राॅकेट सिंह-सेल्समैन आॅफ द ईयर ईमानदारी और समर्पण का महत्व बताते हुए सिखाते हुए
हमें सिखाती है कि ईमानदारी, नैतिकता और कड़ी मेहनत के जरिए ही कामयाबी हासिल की जा सकती है. फिल्म का नायक हरप्रीत सिंह बेदी एक असफल सेल्समैन है, क्योंकि वह मूल्यों और नैतिकता में विश्वास करता है. जब उसे उसकी असफलता के लिए अपमानित और अवनत किया जाता है तो वह अपना खुद का काम करने का फैसला करता है. वह अपने जैसी सोच वाले साथियों के साथ मिलकर एक टीम का गठन करता है और अंततः अपने उसूलों से समझौता किए बिना रेस जीतने में सफल होता है. इसके निर्देशक शिमित अमीन हैं.

2009 की थ्री इडियट्स हमें सीखने और याद करने के फर्क के बारे में बारीकी से समझाती है और बताती है कि काबिलियत रटने से नहीं, सीखने से आती है. ‘वायरस’ से संक्रमित संस्थान और छात्रों के बीच, जो चौबीसों घंटे किताबों का रट्टा मारते रहने को ही कामयाबी का रास्ता मानते हैं, नायक रैंचो एक नायाब प्रजाति का विद्यार्थी है, जिसका अपना ही दर्शन है कि कामयाबी की पीछे नहीं, बल्कि काबिलियत के पीछे भागो, कामयाबी झख मारकर तुम्हारे पीछे आएगी. यह उच्च शिक्षण संस्थानों के पाखंडों और स्टीरियोटाइप्स पर करारी चोट करती है. इसका निर्देशन राजकुमार हिरानी ने किया.

2012 में प्रदर्शित ओह माई गाॅड पाखंड पर प्रहार करती है. ईश्वर के नाम पर दुकान चला रहे धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों से उत्तरदायित्व की माँग करने वाली इस फिल्म का नायक कांजी लालजी मेहता नामक एक मध्यमवर्गीय दुकानदार है, जो अंधविश्वासों और ढकोसलों में यकीन नहीं रखता. एक भूकंप में दुकान तबाह होने के बाद जब बीमा कंपनी इसे ईश्वरीय कृत्य बताते हुए बीमे की रकम देने से इंकार करती है तो वह ईश्वर के खिलाफ ही मुकदमा ठोक देता है कि ईश्वर के नाम पर धन बटोर रहे लोग उसके नुकसान की भरपाई करें. यह फिल्म ईश्वर से सीधे संवाद का संदेश देते हुए मध्यस्थों की अनावश्यकता को रेखांकित करती है. इसका निर्देशन उमेश शुक्ल ने किया है.

2016 में आई एयरलिफ्ट संकट में एकजुटता का महत्व बताती है. 1990 में इराक द्वारा कुवैत पर कब्जे के तुरंत बाद के घटनाक्रम पर केंद्रित यह फिल्म हमें संदेश देती है कि जब संकट आए तो हमें अपने सारे पूर्वाग्रहों को तिलांजलि देते हुए एकजुट होकर उससे निकलने का प्रयास करना चाहिए. इसका नायक रंजीत कत्याल नामका एक कुवैत बेस्ड बिजनेस टायकून है, जो ज्यादातर एनआरआईज की तरह स्वयं को भारतीय की बजाए कुवैती कहलाना पसंद करता है. लेकिन, जब सद्दाम के हमले के बाद उसके परिवार, कर्मचारियों और दूसरे कुवैती भारतीयों की जान पर बन आती है तो वह हर जोखिम और नुकसान उठाकर उनका साथ देता है और उनकी स्वदेश वापसी सुनिश्चित कराकर ही चैन लेता है. इसके निर्देशक राजा मेनन हैं.

2016 की ही एक और फ़िल्म पिंक कहती है, नहीं मतलब नहीं. स्त्री के मौन या इंकार को स्वीकृति का लक्षण मानने वाली पुरुषवादी सोच पर प्रहार करती इस फिल्म का स्पष्ट संदेश यह है कि स्त्री की स्वच्छंदता या आधुनिकता का अर्थ उसकी उपलब्धता नहीं है, अगर वह इंकार करती है तो इसका मतलब इंकार होता है और इस इंकार को स्वीकार न करना उसके विरुद्ध अपराध माना जाना चाहिए. इस बात का कोई मतलब नहीं कि वह अपने निजी जीवन में क्या करती है, कैसे रहती है और किसके साथ रहती है. प्रभावशाली परिवारों से ताल्लुक रखते बिगड़ैल रईसजादों के यौन आक्रमण की शिकार मीनल, फलक और एंड्रेया की पैरवी कर बुजुर्ग वकील दीपक सहगल को इस बात को स्थापित करने के लिए एक लंबी ल़ड़ाई लड़नी पड़ती है. इसके निर्देशकः शोजीत सरकार हैं.

2017 में प्रदर्शित हिंदी मीडियम भाषाई हीनभावना से छुटकारा दिलाती है और बड़े सीधे-सादे तरीके से आधुनिक मध्यवर्ग की इस मानसिकता पर कटाक्ष करती है कि अपने बच्चों को अच्छा भविष्य देने के लिए उन्हें अंग्रेजी माध्यम वाले महंगे स्कूलों में पढ़ाना जरूरी है. ऐसे ही एक स्कूल में अपनी बेटी का एडमिशन कराने की जुगत में लगे एक पति-पत्नी, राज और मीता बत्रा के तनाव और ऊटपटांग गतिविधियों के माध्यम से इस फिल्म में निजी स्कूलों की ढिठाई, दबंगई और कपट और इसकी वजह से बच्चों के माता-पिता को होने वाली परेशानियों को दर्शाया गया है. अंततः उन्हें अपने प्रयासों में सफलता मिलने के बावजूद इस सोच की निरर्थकता का अहसास होता है और वे अपनी बेटी को एक सरकारी स्कूल में दाखिला दिलाते हैं. इसका निर्देशन साकेत चौधरी ने किया है.

यह कोई अंतिम सूची नहीं है, फेहरिश्त कितनी भी लंबी हो सकती है, क्योंकि हर साल कुछ फिल्में ऐसी जरूर आती हैं जो अंधेरे में रोशनी, धूप में छांह, सूखे में बारिश और पतझर में बहार सरीखी साबित होती हैं. इसलिए फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन का जरिया मानने की बजाए, हमें उनमें छिपे संदेशों को पहचानने की आदत भी डालनी चाहिए. यह ठीक है कि ज्यादातर फिल्में सिर्फ पैसा कमाने के तकाजों के हिसाब से ही निर्मित हो रही हैं, लेकिन फिर भी अगर हमें उनमें से कुछ से कोई नई या अच्छी बात सीखने को मिले तो उसे क्यों छोड़ा जाए.

  • संदीप अग्रवाल

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