पल में तोला, पल में माशा

अगर आप रेगुलरली फेसबुक या इसके जैसी दूसरी कोई भी सोशल मीडिया नेटवर्किंग साइट विजिट करते हैं तो आप इस बात को शिद्दत से महसूस कर सकते हैं कि कैसे कोई आदमी एक पल में हीरो और दूसरे पल में जीरो, या इसका उलट, हो जाता है. यहाँ भाजपा बनाम गैर भाजपा राजनीतिक दलों की आईटी टीम की बात नहीं हो रही, ​बल्कि उन स्वस्फूर्त टिप्पणीकारों की बात की जा रही है, जिन्हें बोलने से पहले न तोलने की बीमारी है और तोला—माशा के फतवे जारी करने का शौक है.

इस लड़ाई को जाने दीजिए, हमारा मुद्दा यह है कि एक संतुलित व्यक्ति कैसे सोशल मीडिया की परस्पर विरोधाभासी टिप्पणियों में घिरकर सच्चाई को समझने की अपने सहज बोध को गंवा देता है. यही वह मंच है, जहाँ एक डॉक्टर को पहले दिन अपने क्लिनिक के आॅक्सिजन सिलेंडर, सरकारी अस्पताल के बच्चों की जान बचाने के लिए लाने के लिए महान घोषित किया जाता है और अगले दि​न इस बात को लेकर उसे लानतें भेजी जाती हैं कि वह सरकारी अस्पताल से सिलेंडर अपने क्लिनिक में ले गया था. इसी मंच पर अपनी बस में सवार यात्रियों को बचाने में आतंकियों की गोली खाने वाला ड्राइवर पहले तारीफें पाता है और तुरंत ऐसे आरोपों का सामना करता है कि वह जानबूझकर बस को उस रूट पर ले गया था, जहाँ उसे आतंकी मौजूद होने के बारे में पता था. यही जगह है, जहाँ रोहतक की दो बहनों को कथित शोहदों को पीटने के लिए पहले दिन नारीशक्ति का प्रतीक घोषित किया जाता है और अगले दिन वे लड़कों को धमकाकर पैसे वसूलने वाली गुंडी करार दे दी जाती हैं.

इसी साल फरवरी में हमने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेन्स्की तक को रूस जैसे विशालकाय देश से टक्कर लेने के लिए दो तरह की प्रतिक्रियाओं से घिरे हुए देखा. एक धारा की पोस्ट कह रही थी कि एक भाँड ( जेलेन्स्की फिल्मों में कामेडियन रह चुके हैं) से इसी अपरिपक्वता की उम्मीद की जा सकती है कि वह बिना सोचेकृसमझे देश को युद्ध की आग में झोंक दे, वहीं दूसरी धारा उन्हें रील लाइफ में कॉमेडियन, रीयल लाइफ में हीरो का खिताब दे रही थी जिसने एक महाशक्ति को चुनौती देने ा साहस दिखाया और खुद सैनिक की वर्दी पहनकर युद्ध मैदान में उतर गया.

ताजा उदाहरण हैं दुनिया के सबसे खुशहाल देश फिनलैंड की प्रधानमंत्री साना मारिन के पार्टी डांस को लेकर चल रहा ट्वीट और कमेंट युद्ध. कुछ लोगों की नजर में वह देश की युवा आकांक्षाओं की प्रतीक बनी हुई हैं तो कुछ के ख्याल से देश के शीर्ष पद की प्रतिष्ठा को धूल में मिलाने वाली अपरिपक्व राजनेता हैं.

आप अगर जरा भी संवदेनशील हैं तो ऐसी तमाम खबरें पढ़कर अपना सिर धुन लेंगे और खुद को लानतें भेजेंगे कि आप क्यों फलां आदमी की सराहना या आलोचना कर रहे थे, यह तो आपकी पिछली राय के एकदम उलट है. खुद को दोष मत दीजिए, बस सच जानने के अपने संसाधन बदलिए. सच्चाई जानने ​के लिए सोशल मीडिया सबसे बदतर जरिया है. इलेक्ट्रानिक मीडिया इससे कुछ बेहतर है, लेकिन अभी भी विश्वसनीयता को लेकर अखबारों की साख अपेक्षाकृत बेहतर कही जा सकती है.

आप परस्पर विरोधी विचारधाराओं के सैलाब को तो नहीं रोक सकते, लेकिन खुद को कोई राय कायम करने में जल्दबाजी से जरूर रोक सकते हैं, ताकि इस नाले के विस्तार में कम से कम आपका खुद का कोई योगदान न हो, जिसके लिए आपको बाद में शर्मिंदगी महसूस हो. पहले सच जानिए, उसके बाद ही किसी के बारे में कोई राय बनाइए.

  • संदीप अग्रवाल

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