जिंदगी की कील पे वक्त के कलेंडर

करीब आठ घंटा पहले वक्त फिर बदल गया…हर क्षण, हर पल बदलता है. लेकिन, अभी का बदलना किसी क्षण का या पल का बदलना नहीं है. यह बदलना है, जैसे आत्मा पुराने शरीर का चोला उतार कर एक नया चोला पहन रही हो. होने को तो जैसे दिन बदलते हैं, महीने बदलते हैं, वैसे ही साल भी बदलते हैं. लेकिन, एक साल का बदलना इतना साधारण भी नहीं है कि उसे एक दिन या महीने के बदलने के सदृश माना जाए.

Image courtesy: Maky_orel (Pixabay.com)

बेशक, एक साल से दूसरे साल की दहलीज पर छलांग में सिर्फ सेकेंड से भी कम का वक्त लगता है. लेकिन, यह सब कुछ बदल देता है. इस बदलाव की प्रक्रिया 31 दिसंबर से कुछ दिन पहले ही शुरू हो जाती है और 1 जनवरी के कई दिन बाद तक चलती है. इस प्रक्रिया के दौरान कितना कुछ घट जाता है…बीते साल की समीक्षा, उपलब्धियों के हर्ष, नाकामियों और हादसों के रंज, गलतियों से मिले सबक, कुछ आए-कुछ गए चेहरों की यादों से लेकर नए साल के संकल्पों और योजनाओं तक, पूरी जिंदगी किसी रस्म की तरह, कुछ दिनों के लिए इन्हीं सब के बीच सिमट जाती है. और यह सिमटना, उस विस्तार और पूर्णता के लिए होता है जो हम स्वयं को देना चाहते हैं.


लेकिन, क्या वाकई हम स्वयं को इस हद तक विस्तृत कर पाते हैं कि परिपूर्ण अनुभव कर सकें? अगर ऐसा होता तो हमें खुद को एक ही संकल्प हर साल याद दिलाने की जरूरत न पड़ती. जिंदगी की कील पर टंगे वक्त के कलेंडर साल दर साल बदलते रहते हैं और हम इसी शिकायत के साथ जीते रहते हैं कि वक्त क्यों नहीं बदलता. दिक्कत यह है कि वक्त के बदलाव को हमने हमेशा कलेंडर बदल देना माना है. कभी हमने उस कील को बदलने की कोशिश नहीं की है, जिस पर वो कलेंडर लटकता है. कील तो कील, यह भी मुमकिन है कि कभी हमने कलेंडर की जगह को भी बदलने के बाबत नहीं सोचा हो.

नए साल में सभी सुख, समृद्धि, सफलता और उपलब्धियां हासिल करें, इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए . पर साथ ही यह संकल्प भी जरूरी है कि अगर आज हमारे वक्त का कलेंडर भी किसी जंग लगी कील पर लटकने वाला है, तो हममें इतनी शक्ति और सामथ्र्य उत्पन्न हो कि हम इस बार इस कलेंडर को लटकाने के लिए एक नई दीवार में एक नई कील गाड़ सकें.

  • संदीप अग्रवाल

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