जीना है तो प्लास्टिक को विदा कहना होगा

प्लास्टिक पॉल्यूशन हमारी धरती और इस पर रहने वाले सभी प्राणियों के जीवन के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बना हुआ है। प्लास्टिक चाहे वह नॉर्मल हो या माइक्रोप्लास्टिक हो या बायोडिग्रेडिबेल, सिंगल यूज प्लास्टिक हो या रियूजेबल, किसी भी रूप में वह हमें सुविधाओं से ज्यादा समस्याएं ही दे रहा है और हमें तरह—तरह से भारी नुकसान पहुँचा रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की एक रिपोर्ट वाकई दहशत पैदा करती है कि दुनिया में हर साल 30 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक कचरा पैदा होता है।  

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यह एक ऐसी समस्या है, जिससे छुटकारा पाने के लिए हम सभी को व्यक्तिगत और साझा प्रयास करने की जरूरत है। दो—तीन साल पहले तक मैं भी दूसरों की तरह ही बिना सोचे—समझे प्लास्टिक चीजों का इस्तेमाल करती थी। लेकिन, यह एक बड़ी समस्या भी है, इसके बारे में मुझे सबसे पहली बार तब पता चला जब मैंने एक गाय के आॅपरेशन की खबर पढ़ी. इस गाय के पेट में दर्द होने के बाद उसे अस्पताल ले जाया गया था। डॉक्टरों ने जब उसका ऑपरेशन किया तो पता चला उसके पेट से करीब नौ किलो पॉलीथिन बैग निकले, जो कचरे के ढेर पर फूड नेस्ट खाते हुए उसके पेट में गए थे। इस खबर ने मेरे मन पर बहुत गहरा असर डाला और मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि उसका क्या होता अगर उसे अस्पताल न ले जाया गया होता? ऐसी और भी न जानें कितनी गाये होंगी, दूसरे प्राणी होंगे, जिनकी तकलीफ का हमें पता नहीं चल पाता और वे बिना इलाज के मर जाते हैं।

इसके बाद मैंने पॉलीथीन और प्लास्टिक की वजह से होने वाले नुकसानों के बारे में जानकारियाँ इकट्ठा करना शुरू कर दिया और जल्दी ही यह महसूस किया कि यह समस्या हमारी कल्पना से कहीं कई गुना ज्यादा बड़ी है।

धीरे—धीरे मैंने जाना कि प्लास्टिक कैसे किसी राक्षस की तरह हमारी नदियों झीलों और समुद्रों को प्रदूषित कर जल जीवन को नष्ट कर रहा है, मिट्टी में मिलकर उसकी उत्पादकता नष्ट कर रहा हैं, हमारी सेहत पर बुरा असर डालकर हमारी जिंदगी को छोटा कर रहा है। इस सबका मुझ पर यह असर पड़ा कि मैंने जितना संभव है, प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल करने का संकल्प लिया।

इसके बाद मैंने अपने परिवार वालों के साथ इस तरह के प्लास्टिक प्रॉडक्ट्स की लिस्ट बनानी शुरू कर दी, जिनकी जगह नॉन प्लास्टिक चीजें यूज की जा सकती हैं। मैंने शुरूआत की अपने स्कूल टिफिन से, प्लास्टिक की जगह मैंने स्टील टिफिन ले जाना शुरू कर दिया। बहुत जल्द हमने पॉलीथीन की जगह घर में बने कपड़े के बने बैग, प्लास्टिक के गमलों की जगह मिट्टी के गमले इस्तेमाल करना शुरु कर दिया, प्लास्टिक के खिलौने और शोपीस की जगह हम घर में मेटल, लकड़ी, काँच, मिटट्टी आदि से बनी चीजें लाने लगे और गिफ्ट में भी ऐसी ही चीजें देने लगे। हमने थैली वाला दूध लाना बंदकर, दूधिये से  दूध मंगाना शुरू कर दिया,  क्योंकि मैंने एक खबर में पढ़ा था कि कैसे इसकी थैली का कोना काटकर निकाला गया दूध निकालने के लिए काटकर फेंके गए इसके नष्ट न किए जा सकने वाले छोटे—छोटे से दिखने वाले कोने हर रोज लाखों—करोड़ों की तादाद में नालियों—नदियों के रास्ते समुद्र में पहुँच जाते हैं और अपने माइक्रोप्लास्टिक से जलजीवों के विनाश की वजह बनते हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की, ‘अवर वर्ल्ड इन डेटा’ की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक महासागरों में दुनिया भर से हर साल जितना प्लास्टिक जाता है, उसका लगभग 80 फीसदी एशियाई नदियों से आता है।  

पूरी दुनिया प्लास्टिक वेस्ट की समस्या से जूझ रही है, कई देशों में इस पर प्रतिबंध लगाया गया है, काफी देश प्लास्टिक को तरह—तरह से प्रोसेस भी कर रहे हैं। जैसे कि फिलीपींस में प्लास्टिक फ्लेमिंगो नाम का एक ग्रुप बोतल, सिंगल यूज प्लास्टिक, चॉकलेट के रैपरों आदि का इस्तेमाल कंस्ट्रक्शन मैटेरियल बनाने के लिए कर रहा है और देश में प्लास्टिक  कचरे को नदियों में जाने से रोकने की कोशिश में जुटा है। फिनलैंड में पुराने फोन और प्लास्टिक चीजों को फेंकने की बजाए पुनर्उपयोग के लिए तैयार किया जा रहा है ।   दुनिया भर में इनोवेटर्स इस समस्या के समाधान के उपाय खोजने में लगे हैं ।   हमारा देश भी इसमें पीछे नहीं है. हाल ही में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक देश के 11 राज्यों में करीब एक लाख किलोमीटर सड़कें प्लास्टिक के कचरे से बनाई गई हैं ।  इसमें लगभग दस हजार करोड़ प्लास्टिक बैग के बराबर प्लास्टिक की खपत का अनुमान लगाया गया है ।

लेकिन समस्या की विकरालता को देखते हुए अभी भी ये सब नाकाफी ही प्रतीत होता है ।  1908 में प्लास्टिक की खोज के बाद के सवा सौ सालों में हमारी प्लास्टिक पर निर्भरता इतनी बढ़ चुकी है कि इसके बिना हमें जीवन अधूरा लगता है ।   ऐसा नहीं है, विकल्प है बस हमें अपनी नजर और नजरिए को विस्तार देने की जरूरत है ।

मैंने इसके लिए स्टेप्स (सेव दाइ अर्थ फ्रॉम प्लास्टिक) नाम का एक एप्प पर काम शुरू किया है, जो न सिर्फ हमें प्लास्टिक के अमर्यादित उपयोग के खतरों के प्रति आगाह कराएगा, बल्कि हमें हमारे रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाली प्लास्टिक चीजों के नॉनप्लास्टिक विकल्प भी सुझाएगा । अभी बोर्ड परीक्षाओं की वजह से इसका काम रुक गया है, लेकिन एग्जाम खत्म हो जाने के बाद मैं इसे फिर से विधिवत शुरू करूंगी।

  • भूमिजा अग्रवाल

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