नई सोच नई क़िताबें

पब्लिकेशन स्टोरी/सूरज पॉकेट बुक्स

हम सभी के जीवन मे कभी न कभी ऐसा होता ही है कि, जिससे हम प्रभावित हों, उसके जैसा बनना या सोचना शुरू कर देते हैं. आईआईटी, बी.एच.यू. से फार्मा डिग्री लेकर, एक कंपनी में अच्छी सर्विस पाने और जीवन की भाग दौड़ में व्यस्त रहने के बावजूद, अनादि शुभानंद जी किताबों के प्रति अपने प्यार, अपने आकर्षण को कभी भूल नहीं पाये और जिस लेखक, श्री एस. सी. बेदी जी की राजन—इकबाल सीरीज को पढ़ते हुए बड़े हुए, उन्हीं के प्रसिद्ध किरदार राजन और इकबाल पर किताबें लिखना शुरू कर दिया.

वैसे तो किताबें लिखना ही बहुत मेहनत का काम है, लेकिन उन्हें पब्लिश करवा पाना उससे भी बड़ा दुरूह काम है,एक लेखक के लिए. राजन-इकबाल पर किताब तो लिख दी, पर किताब छपवाने में शुभानंद को नाकों चने चबाने पड़े, ऐसे में शुभानंद ने सोचा कि खुद ही क्यों ना प्रकाशक बन जाया जाए. फिर इसी उधेड़बुन में 2012 में जन्म हुआ सूरज पॉकेट बुक्स का , और पहले ही बुक सेट में राजन इकबाल रीबोर्न सिरीज के दो उपन्यासों का शानदार आगाज हुआ, जिसे पाठकों ने हाथों हाथ लिया.

अब अकेले तो कुछ हो नही सकता था. हर नए काम के लिए टीम की जरूरत होती है, तो इन्होंने भी टीम बनाना शुरू कर दिया. ऐसे में इनके साथ मिथिलेश गुप्ता, देवेंद्र पांडेय, निशांत मौर्य, शाहनवाज़ खान, आदित्य वत्स और अन्य मित्र जुड़े और सूरज पॉकेट बुक्स से अन्य लेखकों की किताबों के छपने का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक सफलतापूर्वक चल रहा है.
शुरू में श्री शुभानंद जी की “जोकर जासूस’, “कमीना”, “मास्टरमाइंड”, देवेंद्र पांडेय जी की “इश्क बकलोल” मिथलेश गुप्ता जी की “वो भयानक रात” “जस्ट लाइक दैट”, डॉ रुनझुन सक्सेना की “चालीसा का रहस्य” जैसी बुक्स आयीं. इसी के साथ शुभानंद ने अपने गुरु स्व. एस सी बेदी के नए उपन्यास भी प्रकाशित किए. तदुपरांत परशुराम शर्मा, वेदप्रकाश कंबोज और अनिल मोहन के वो पुराने नोवेल्स रीप्रिंट के रूप में सामने आए, जिनका मिलना पाठकों के लिए मुमकिन ही नहीं था.

मेरी निगाह में सूरज पॉकेट बुक्स का उदय, एक उगते हुए सूर्य के समान है जिसने मृतप्राय हिंदी बुक प्रकाशन को फिर से सफलता पूर्वक जीवित किया. 2014 या 2015 में, जिस समय सब टीवी सीरियलों, फिल्मों या मोबाइल या किंडल जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिजी थे, तब सूरज पॉकेट बुक्स ने बेहतरीन क्वालिटी के पेजेस पर बढ़िया प्रिंटिंग के साथ, कम कीमत पर बुक्स पब्लिश कीं और ना केवल मार्केट में अपनी मजबूत जगह बनाई, बल्कि कहा जाए तो, मार्केट पर छा गए. इनकी छापी लगभग सभी बुक्स को भी पाठकों ने भी हाथोंहाथ लिया.

किताब जगत में सूरज पॉकेट का कॉन्ट्रिब्यूशन सिर्फ़ इस बात के लिए नहीं है कि उन्होंने, अच्छे राइटर्स की बुक्स पब्लिश कीं, या पुराने राइटर्स की बुक्स रीप्रिंट की, बल्कि सूरज पॉकेट्स का सबसे बड़ा कॉन्ट्रिब्यूशन इस बात के लिए है कि जब नए राइटर्स की एकदम कमी हो गई थी, या नए राइटर्स सामने आने ही बन्द हो गए थे, तब सूरज पॉकेट ने 2015 के बाद एक के बाद एक टैलेंटेड राइटर्स को मौका देना शुरू किया और हमें पिछले 4—5 वर्षों में 20 से ज्यादा नए राइटर्स से रूबरू कराया.
इनमे प्रमुख हैं, संतोष पाठक, रमाकांत मिश्र, सबा खान, देवाशीष उपाध्याय, मोहन मौर्य, आकाश पाठक, सोम जायसवाल, विजय कुमार बोहरा, अमित श्रीवास्तव, अनुराग कुमार जीनियस, जितेन्द्रनाथ, कबीर अहमद और नए सेट में इंट्रोड्यूस किये गए विकास सी.एस. झा, जयदेव चावरिया आदि. प्राप्त जानकारी के अनुसार सूरज से शीघ्र ही श्री शिवेंद्र सूर्यवंशी जी की सात किताबों का सेट भी आने वाला है जिसमे “सन राइजिंग” “मायावन” व अन्य पाँच बुक्स का समावेश है.
सूरज पॉकेट ने सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए बहुत कम समय मे अपनी 100वीं किताब, श्री देवेन पांडेय जी की “जा चुड़ैल” पब्लिश की जो निसंदेह गर्व की बात है.
इन सब के अतिरिक्त सूरज पॉकेट से हमें ली चाइल्ड की “वन शॉट” (अनुवादक—सबा खान) और जेम्स हेडली चेज की कई इंग्लिश बुक्स के बेहतरीन अनुवाद हिंदी में प्राप्त हुए. इनमें “आखिरी दांव” सबा खान द्वारा, “पैसा ये पैसा” और “खाली हाथ” जितेन्द्रनाथ और “दौलत का खेल” का अनुवाद आलोक कुमार द्वारा किया गया. बड़ी बात ये है कि ये अनुवाद इतने बेहतरीन थे कि लगा ही नहीं कि, ये अनुवाद है बल्कि लगा कि जैसे हिंदी की ही बुक्स हैं. इसके अलावा एक और बात के लिए सूरज की सराहना की जानी चाहिए कि जेम्स हेडली चेइज के उपन्यास अपने पुराने दौर में अधनंगी लड़कियों वाले कवर की वजह से, अंदर कोई अश्लीलता न होते हुए भी, चोरी—चोरी पढ़ने पड़ते थे, लेकिन सूरज पॉकेट बुक्स के स्तरीय कवरों ने उन्हें वह सम्मान दिलाया, जिसके कि वे हकदार थे.
सूरज पॉकेट बुक्स के सफर में तब चार चांद लगे, जब उन्हें श्री सुरेंद्र मोहन पाठक की जी “तकदीर का तोहफ़ा” को पब्लिश करने का सौभाग्य मिला. शुभानंद के अनुसार “तकदीर का तोहफा” सूरज पॉकेट्स से आई सबसे ज्यादा बिकने वाली बुक भी है. “तकदीर का तोहफा” के अलावा “वो भयानक रात” “बाली सीरीज” “ख़्वाहिशों का सफर” “अगिया बेताल”, “मास्टरमाइंड” व कई अन्य किताबों की डिमांड अभी तक बनी हुई है.मेरे पास खुद सूरज पॉकेट्स की 50 से ज्यादा बुक्स हैं जो अपनी बेहतरीन फ्रंट कवर और क्वालिटी की वजह से मेरी बुकसेल्फ़ की शोभा बढ़ा रही हैं.
आज बुक जगत में सूरज पॉकेट एक जानामाना नाम बन गया है, जिसकी एक वजह यहां से अच्छी कहानियों वाली किताबों का आना है, अगर किताबों की कहानी अच्छी होगी, दमदार होगी, फिर चाहे लेखक नया हो या पुराना, किताबों को पाठक हाथोंहाथ ले ही लेते हैं. यही सूरज पॉकेट बुक्स की सफलता का राज है, उम्मीद है सूरज पॉकेट बुक्स से हर निकट भविष्य में अच्छी किताबें पढ़ने को मिलती रहेंगी और नए राइटर्स को उनकी पहली किताब छापने का चांस देने के लिए भी सूरज पॉकेट बुक्स साधुवाद के पात्र हैं.

  • एडवोकेट संजीव शर्मा, पुणे

14 thoughts on “नई सोच नई क़िताबें

  1. सूरज बुक्स ने निःसंदेह एक दुरूह स्वप्न को साकार कर दिया है। बेहतरीन साजसज्जा के साथ लोकप्रिय साहित्य को वापिस मुख्यधारा में स्थापित कर दिया है। यह तभी सम्भव हो सका है जब आप जैसे सहयोगी पाठक और दोस्त साथ खड़े हुए हैं। बेहतरीन 💐💐

  2. सूरज शुक्ला

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    वाह सर सूरज पॉकेट बुक्स के बारे में ये जानकारी निःसन्देह गौरवांवित महसूस कराने वाली है, बहुत बहुत शुक्रिया आपका।

  3. एकदम सही बात। सूरज ने मृतप्राय हो चुके लोकप्रिय साहित्य के प्रकाशन में जो प्राण फूँके हैं वह निसंदेह सराहनीय है। साथ ही वाजिब कीमतों में पुस्तकें मुहैया करवाने में भी उनका योगदान है। उम्मीद है सूरज सूर्य के समान यूँ ही चमचमाता रहेगा।

  4. सम्पूर्ण सूरज परिवार की लगन और मेहनत इस सफलता और नाम के पीछे है और आप जैसे प्रसंशकों के बिना तो इस मुकाम तक पहुंचना शर्तिया नामुमकिन था। बहुत बहुत आभार। बेहद प्रेरणादायक व प्रोत्साहित करता लेख।

  5. टी. वी, स्मार्ट फोन और वेब सीरीज के इस जमाने में भी अगर लोगों का रुझान एक बार फिर से किताबों की ओर हो रहा है तो इसमें सूरज पॉकेट बुक्स एवं उसके संस्थापक श्री शुभानंद जी के योगदान को कतई भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुरेंद्र मोहन पाठक, वेदप्रकाश शर्मा, ओमप्रकाश शर्मा, वेदप्रकाश कंबोज, एस. सी. बेदी जैसे लेखकों को पढ़कर बड़ी हुई पीढ़ी के लिए सूरज पॉकेट बुक्स अपनी किताबों के साथ उम्मीद की एक किरण लेकर आया। कुछ समय पहले तक सस्पेंस थ्रिलर उपन्यास जिसे गुजरे जमाने में लुगदी साहित्य भी कहा जाता था अपनी मरणासन अवस्था में था जिसे सूरज पॉकेट बुक्स ने एक बार फिर से जीवित करने का प्रयास किया जो उपन्यास दर उपन्यास आज भी जारी है। श्री शुभनन्द जी का यह सराहनीय प्रयास और हिंदी साहित्य को सुदृढ करने के लिए दिया गया उनका यह योगदान वाकई काबिलेतारीफ है।

  6. शुभानंद जी के विषय में जो भी शर्मा जी ने लिखा उससे शुभानंद जी का कठिन परिश्रम एवं लगन स्पष्ट झलकता है । सूरज पैकेट बुक्स की लोकप्रियता उन्हें पारितोषक के रूप में प्राप्त हुई है ।

    हादी हसन

  7. BRAJESH KUMAR SHARMA

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    बहुत सुंदर लेख। शुभानन्द जी वर्तमान के टॉप लेखकों में से है। सूरज पॉकेट बुक्स सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।

    1. निस्संदेह सूरज पॉकेट बुक्स की वजह से मृतप्राय हिंदी उपन्यासों की दुनियां फिर से जीवित हुई है।

  8. बेहतरीन लेख। अक्सर ऐसा होता है कि कुछ चीजें बीतने के बाद दोबारा वापस आती हैं। सूरज पॉकेट बुक्स ने अपने सामर्थ्य से ये साबित भी किया है। विश्वास है कि आने वाले समय मे पब्लिकेशन की दुनिया में सिर्फ सूरज पॉकेट बुक्स का ही राज होगा

  9. हिंदी पल्प फिक्शन के जीर्णोद्धार में महती भूमिका निभाई है सूरज पॉकेट बुक्स ने। शुभानंद जी निश्चित ही बधाई के पात्र है।

  10. बहुत सही लिखा है, ऐसे समय में जब प्रकाशन संस्थाएं बंद हो रही थी, ऐसे वक्त में सूरज पॉकेट बुक्स ने अपना एक मुकाम बनाया है। इसके लिए सूरज की टीम बधाई की पात्र है।

  11. Anurag Kumar genius

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    आपने बिलकुल सही लिखा। शुभानन्द जी ने मरते हुए पॉकेट बुक्स के धंधे को पुना जीवित किया है जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं और आप इस बेहतरीन लेख के लिए। शुक्रिया सर।

  12. बहुत ही सरहनीय प्रयास, उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं

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