सैर वक्त की भूलभुलैया की

आखिरी प्रेमगीत, कोविड—19 जैसी अलग—अलग तरह की किताबों के लेखक अभिषेक जोशी एक बार फिर एक अलग तरह की किताब लेकर आए हैं, द रियल टाइम मशीन. दिलचस्प रूप से इस विषय पर आधारित दूसरी कथाओं से यह इस मायने में अलग है कि अधिकतर कहानियों में कुछ लोग एक ही टाइम मशीन के जरिए अतीत या भविष्य की यात्रा करते हैं, लेकिन इसमें बहुत सारी टाइम मशीन मौजूद हैं, जो अलग—अलग यात्रियों, जिन्हें पुस्तक में वालंटियर कहा गया है, अलग—अलग काल खंडों में ले जाती हैं.

1895 में प्रकाशित एच.जी.वेल्स की विज्ञान फंतासी द टाइम मशीन को समययात्रा पर आधारित पहली रचना माना जाता है, हालांकि हमारे धर्मग्रंथों में तो समय यात्रा हजारों साल से मौजूद है, हम भी इस पर यकीन करें तो  पिछले सवा सौ सालों में काल—यात्रा को लेकर दुनिया भर में बहुत सारी रचनाएं, ​पुस्तकें, फिल्में रची गई हैं.

एक और बात, जो इसे समय यात्रा पर आधारित अन्य रचनाओं से अलग करती है, वह यह है कि इसमें विज्ञान और अध्यात्म को  प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक—दूसरे के पूरक के रूप में प्रस्तुत किया गया है. समय का वैज्ञानिक स्वरूप अगर पाठक को रोमांचित करता है तो उसी का आध्यात्मिक स्वरूप विस्मित करता है कि कैसे जिन सवालों का जवाब विज्ञान अभी खोज ही रहा है, वे हमारी आध्यात्मिक विरासत में बहुत स्पष्टता के साथ मौजूद हैं. जैसे कि इसमें ब्रह्मा के चार मुखों को समय के चार विविध आयामों से जोड़कर बताया गया है कि जिस तरह हम एक बार में ब्रह्मा जी के तीन ही सिर देख पाते हैं और चौथा हमेशा अदृश्य रहता है, उसी प्रकार समय का चौथा आयाम भी हमेशा हमारी नजरों से बचा रहता है. ऐसे कई उद्धरण पुस्तक में मौजूद हैं, हो सकता है कि कुछ से आप सहमत न हों, लेकिन सम्मोहित अवश्य होंगे.

जहाँ तक किताब की कहानी का सवाल है तो वह एक सवाल के साथ शुरू होती है और उसी के जवाब की तलाश में अपना सफर तय करती जाती है. अपने खराब पैर की वजह से मानसिक यंत्रणा भुगत रहा जावेद जानता है कि यह उसके परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही समस्या है, इसलिए वह नहीं चाहता कि उसके यहाँ भी उसी की तरह एक विकलांग बच्चा पैदा हो. वह जानना चाहता है ​कि आखिर वह मनहूस घड़ी और उससे भी मनहूस वजह कौन सी थी, जब उसके परिवार में इस नामुराद बीमारी ने घुसपैठ की. उसे इसका जवाब चाहिए और द रियल टाइम मशीन नामक कालवाहन बनाने वाले डॉ. रामावल्ली को अपनी खोज के परीक्षण और विकास के लिए वालंटियर. जरूरतों के आदान—प्रदान का यह समीकरण जावेद और उसके दोस्त इरफान को काल के अलग—अलग दौरों में ले जाता है, जहाँ उन्हें एक से बढ़कर एक अनूठे अनुभव होते हैं और पाठकों को भी.

कहानी में कालयात्रियों की तीन जोड़ियाँ हैं जो एक विशेष तरह की घड़ी की मदद से समय की सीमाओं को धता बताते हुए, अपने—अपने सच की तलाश में हैं. एक घड़ी जावेद और उसके दोस्त के पास है, जिससे वे अतीत की सैर कर रहे हैं, दूसरी जावेद की पत्नी मिस्बा और उसके बेटे आफताब के पास, जो उन्हें भविष्य के अलग—अलग समय में ले जा रही है और तीसरी डॉ. रामावल्ली और उनके पत्रकार सहयोगी सहस्त्रबाहु के पास, जिसके जरिए वे वर्तमान से कुछ ही साल पीछे या कुछ ही साल आगे तक जा—जाकर लौट रहे हैं. इन तीन समानान्तर चल रही कथाओं में पढ़ते—पढ़ते ऐसा महसूस होने लगता है, मानो पाठक एक किताब के पास नहीं, बल्कि एक टाइममशीन में बैठा हुआ हो.

पुस्तक की शैली अत्यंत विवरणात्मक और भाषा बहुत संतुलित है. समय यात्रा जैसे गूढ़ विषय को इतने सरल अंदाज में प्रस्तुत करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी, जिस पर अभिषेक ने बहुत कुशलता से विजय पाई और साबित किया है कि रियल टाइम मशीन का लेखक एक रियल जीनियस है.

अगर आप अच्छी किताबें, खासकर साइंस फिक्शन, पढ़ने के शौकीन हैं तो आपको यह किताब अवश्य पढ़नी चाहिए. किताब आॅर्डर करने के लिए आप इस लिंक का इस्तेमाल कर सकते हैं .

  • संदीप अग्रवाल

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