युद्धं शरणं गच्छामि्

रूस द्वारा यूक्रेन की ‘निरीह’ जनता पर वैक्यूम बम डालकर उन्हें वेपोराइज करने की खबरें प्रमुखता से प्रसारित की जा रही हैं. दुनिया भर में लोग भावुक होकर पुतिन की अमानवीयता पर टिप्पणियां कर रहे हैं. असली खलनायक नाटो, पूरे परिदृश्य पर मन ही मन कहकहे लगा रहा है.

Image courtesy: TheDigitalArtist(Pixabay)

रूस ने ऐसा क्यों किया, इस बात को लेकर संतुलित सोच और रणनीतिक समझ रखने वाले मानते हैं और जानते हैं कि रूस के लिए अपने विरोध में गठित नाटो की घेराबंदी को देखते हुए ऐसा करना आवश्यक हो गया था. कोई भी देश अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकता, रूस ने भी नहीं किया.
भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम से दो महत्वपूर्ण सबक हैं. एक, ​निरस्त्रीकरण के फैशन में शामिल होकर अपना हाल यूक्रेन जैसा न बना लिया जाए, जिसने इस संधि में शामिल होने की वजह से अपने परमाणु हथियारों से तौबा कर ली थी. दूसरा, किसी के बहकावे में या किसी के भरोसे किसी से बेवजह टकराने की मूर्खता न की जाए और सिर्फ उन्हीं लड़ाईयों में शामिल हुआ जाए, जो अपने दम पर लड़ी—जीती जा सकें.
जॉर्ज आॅरवेल ने अपने विश्वप्रसिद्ध उपन्यास 1984 में कहा है, युद्ध ही शांति है. रूस इसी का अनुसरण कर रहा है. भविष्य के खतरों से शुरू में ही निपटकर वह आगे शांति से रहना चाहता है. इसके लिए उसकी निंदा क्यों?
यूक्रेन की जनता से सहानुभूति हो सकती है, लेकिन अगर जनता खुद बंदूकें उठाकर युद्ध में शामिल होने को आमादा है तो उसे वही परिणाम भुगतने होंगे, जो किसी युद्ध में सेना के सामने आते हैं. हर नागरिक वर्दी में सैनिक है, और हर सैनिक वर्दी के बिना आम नागरिक है. हर जीवन का एक मोल होता है, उसकी क्षति पर दुख होना स्वाभाविक ही है. लेकिन यह दुख सलेक्टिव नहीं होना चाहिए.
युद्ध के दुष्परिणाम उसमें शामिल हर पक्ष भुगतता है, कोई प्रत्यक्ष, कोई परोक्ष… जीते कोई भी, कीमत सभी पक्ष चुकाते हैं.

  • संदीप अग्रवाल

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