नेट बिना जीना

पिछले साल नवंबर के पहले पखवाड़े में दुनिया भर के इंटरनेट यूजर्स ने एक नया अनुभव किया… यह अनुभव था तकरीबन पौन घंटे तक गूगल की अधिकतर सेवाओं को इस्तेमाल न करने की छटपटाहट से गुजरने का. इन 45 मिनटों में यूर्जस को इंटरनेट के संदर्भ में ‘खुदा तो नहीं, लेकिन खुदा से कम भी नहीं…’ की याद दिला दी, जब वे गूगल डॉक्यूमेंट्स, गूगल मैप्स, गूगल कैलेंडर, गूगल स्लाइड्स, ब्लॉगर, जीमेल और यूट्यूब जैसी अनेक सेवाओं और एप्लिकेशंस का इस्तेमाल करने में लाचार थे. हर सर्विस को असेस करने पर एक एरर कोड के साथ ‘… दिस इज आॅल वाट वी कैन टैल’ मैसेज आता तो इन यूजर्स की बेचैनी और भी बढ़ जाती और उन्हें एहसास होता कि जरूर यह कोइ ऐसा हादसा है, जिसने उन्हें ही नहीं, बल्कि गूगल बाबा को भी बेबस कर के रख दिया है.

बाद में गूगल ने इसके लिए अपने साढ़े तीन बिलियन यूजर्स से माफी मांगी और कहा कि इस ग्लोबल शट डाउन के पीछे क्या वजहें थी, उनके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन कंपनी अपने सुरक्षा उपायों को और मजबूत बनाने के लिए काम कर रही है. हालांकि साइबर एक्सपर्ट्स ने चेताना शुरू कर दिया है कि गूगल की फ्री सेवाएं यूज करने वाले यूजर्स के लिए यह खतरे की घंटी है और मुमकिन है कि जल्दी ही उन्हें जीमेल, यूट्यूब और दूसरी सेवाओं के इस्तेमाल को जारी रखने के लिए फीस चुकाने की जरूरत पड़े.

बहरहाल, यह तो सिर्फ एक गूगल की बात थी जिसके काम करना बंद करते ही इतनी बड़ी तादाद में दुनिया भर के यूजर हलकान हो गए. लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि अगर पूरी इंटरनेट ही ठप पड़ जाए तो एच2ओ और ओ2 की तरह डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू को अपने जीवन का आधार बना चुके नेटीजनों के जीवन पर क्या असर पड़ने वाला है?

इसे समझने के लिए सर्वाधिक प्रचलित प्लेटफॉर्म्स पर बीते साल हमारे इंटरनेट उपयोग पर एक नजर डालते हैं.वर्ष 2020 में हर मिनट फेसबुक पर डेढ लाख मैसेज शेयर किए जाने के साथ—साथ 1,47,000 फोटो अपलोड हुए, यूट्यूब पर 500 घंटे के वीडियो, इंस्टाग्राम पर यूजर्स ने 3,47,000 स्टोरीज पोस्ट कीं, रेडिट पर 4,79,452 लोग एंगेज रहे, जूम ने 2,08,333 लोगों की मीटिंग होस्ट की, नेटफ्लिक्स यूजर्स ने 4,04,444 घंटे की स्ट्रीमिंग एन्जॉय की, व्हाट्एप्प पर 41,666,667 मैसेज शेयर किए गए, 1,388,889 वीडियो/वॉयस कॉल की गईं, ट्विटर से 319 नए यूजर्स जुड़े, कन्यूमर्स ने आॅनलाइन दस लाख डॉलर खर्च किए और एप्स पर 3,805 डॉलर, लिंक्डइन पर 69,444 लोगों ने जॉब के लिए एप्लाई किया, 2,704 टिकटॉक इन्स्टॉल हुए, अमेजन ने 6,659 पैकेज गंतव्य तक पहुँचाए. यह सब न होता, अगर सिर्फ एक ही मिनट के लिए इंटरनेट ठप्प पड़ जाता.

1995 में दुनिया में इंटरनेट यूजर्स की तादाद महज एक फीसदी थी, जो आज पच्चीस सालों में बढ़कर लगभग साठ फीसदी हो चुकी है. छह साल पहले यानी 2014 के तीन बिलियन इंटरनेट यूजर्स के मुकाबले आज करीब डेढ़ गुना यानी साढ़़े चार बिलियन लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं. अगर मान लें इनमें से आधे यूजर्स भी ऐसे हैं, जो अपने जरूरी कामों के लिए इंटरनेट पर आश्रित हैं तो इसका अर्थ यह होगा कि दुनिया की करीब एक तिहाई आबादी इंटरनेट के न रहने पर पंगु हो जाएगी. संचार, सुरक्षा, एडमिनिस्ट्रेशन, ई—गवर्नेंस, स्पेस मिशन , परिवहन, ई—कॉमर्स, तकनीक, उद्योग—व्यापार जैसे अनगिनत क्षेत्रों पर तो इसका जो असर पड़ेगा, वह अलग…हो सकता है कि इसका परोक्ष असर विश्व की तीन चौथाई से ज्यादा आबादी को अपनी चपेट में ले ले. इसी इंटरनेटविहीन स्थिति को डिजीटल डार्क एज के नाम से जाना जाता है और सायबर जगत के विद्वानों का मानना है कि हम इससे बच नहीं सकते, एक न एक दिन जरूर हमें इस डार्क एज का सामना करना पड़ेगा. इंटरनेट यूजर्स की संख्या में जिस तरह से बढ़ोत्तरी हो रही है, उसके आधार पर कहें तो अगले एक दशक में दुनिया की शत—प्रतिशत आबादी, सैद्धांतिक रूप से, इंटरनेट तक पहुँच हासिल कर चुकी होगी. जैसे—जैसे इंटरनेट का यूज बढ़ता जाएगा, डार्क एज का खतरा भी उतना ही बढ़ता जाएगा.

दुष्यंत कुमार के शब्दों में, ‘जिस बात का खतरा है सोचो कि वो कल होगी…’ मान लेते हैं कि कल सुबह आप सोकर उठते हैं और पाते हैं कि सायबर वर्ल्ड का डूम्स डे (प्रलय का दिन) आ चुका है और इंटरनेट ने हमेशा—हमेशा के लिए काम करना बंद कर दिया है, तो आपके साथ अब जो होने वाला है, वह वैसे तो इस पर निर्भर करता है कि आप इंटरनेट पर कितना वक्त किस चीज में खर्च करते हैं. फिर भी, हम समझते हैं कि आप उन औसत नेटीजंस में से हैं, जिन्होंने वर्ष 2020 में हर रोज अपने करीब दो घंटे इंटरनेट पर बिताए हैं. ऐसे में इंटरनेट के बिना आपके साथ कल क्या—क्या हो सकता है, इसकी एक संभावित तस्वीर कुछ ऐसी है:

व्हाट्सएप्प और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया एप्प पर न आप अपनी खबर अपने कॉन्टेक्ट्स तक पहुँचा पा रहे हैं और न उनकी खबर पा रहे हैं. आपको अपने बिल पे करने हैं, लेकिन क्रेडिट कार्ड, नेट बैंकिंग, ई—वैलेट सब काम करना बंद कर चुके हैं और आप समझ नहीं पा रहे हैं कि इनका भुगतान करने के लिए कहाँ जाएं. आप खाने—पीने की चीजों से लेकर ग्रॉसरी तक कुछ भी मंगा नहीं पा रहे हैं, ओटीटी पर अपनी पसंद के गाने सुनने या मूवी या वेबसीरीज देखने की तलब नहीं मिटा पा रहे हैं, आॅफिस/कॉलेज का वक्त हो गया है लेकिन वर्क फ्रॉम होम या स्टडी फ्रॉम होम के लिए जरूरी एप्प आप असेस नहीं कर पा रहे हैं, इंटरनेट आॅफ थिंग्स के अंतर्गत खरीदे गए आपके बहुत सारे गैजेट्स और मशीनें काम करना बंद कर चुके हैं, कहीं जाना था, लेकिन अब एड्रेस या लोकेशन नहीं खोज पा रहे हैं, कुछ जरूरी ई—मेल भेजनी थीं, जो अब नहीं जा पा रही हैं, आपने अपने जो भी जरूरी डॉक्यूमेंट्स क्लाउड में अपलोड कर रखे थे वे सब आपकी पहुँच से परे हो जाएंगे.. यह फेहरिश्त बहुत लंबी हो सकती है. लेकिन, इतना भी आपको पैनिक करने के लिए कम नहीं है.

कभी आपने सोचा है कि ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे? अब या तो यह उम्मीद और इंतजार करेंगे कि कोई चमत्कार हो और मुर्दा हो चुके इंटरनेट में फिर से प्राणों का संचार हो जाए, या फिर इस बात का शुक्र मनाएंगे कि अभी भी तकरीबन आधी दुनिया बची हुई है, जो आॅफ लाइन संचालित होती है और आपकी आधी से ज्यादा जरूरतें खुद घर से बाहर निकलते ही पूरी हो सकती हैं. हालांकि यह भी बहुत आसान नहीं होगा. अगर आप बाजार जाकर कुछ खरीदना चाहते हैं तो कैशलैस सिस्टम काम नहीं करेगा, आपको कैश निकालने के लिए बैंक जाना पड़ेगा, जहाँ आप जैसे लोगों की भारी भीड़ होगी, और वहाँ जाकर आप पाएंगे कि बैंकवाले आपके खाते की जानकारी ही हासिल नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि इंटरनेट न होने से सर्वर डाउन हो चुके हैं. सिर्फ बैंक ही नहीं, बल्कि हर उस जगह भीड़ लगभग दोगुनी होगी, जहाँ इंटरनेट की सुविधा का लाभ उठाने वाले लोग सालों से जाकर नहीं झांके थे.

यह तो हुई व्यक्तिगत समस्या की बात, अगर इसे संस्थागत स्तर पर देखें तो यह वर्च्युअल प्रलय, वास्तविक प्रलय से कम घातक नजर नहीं आती. इसकी वजह यह है कि आज इंटरनेट हर क्षेत्र में इतनी गहराई तक पैठ कर चुका है कि इसके न रहने पर दुनिया के अधिकतर काम ठप्प पड़ जाने का पूरा—पूरा अंदेशा है. और दुर्भाग्य से हमने ज्यादातर मामलों में ऐसे हालात के लिए कोई तैयारी नहीं कर रखी है. बस अधिक से अधिक चीजों को वर्च्युअल बनाते जा रहे हैं और उनकी फिजीकल एग्जिस्टेंस को डिस्पोज करते जा रहे हैं.

आप सोच रहे होंगे कि भला ऐसा होगा ही क्यों? जो लोग इंटरनेट की दुनिया का संचालन कर रहे हैं, कोई बेवकूफ थोड़े ही हैं. आखिर उन्होंने भी तो इस तरह की किसी भी स्थिति से बचने के लिए पुख्ता इंतजाम करके रखे ही होंगे. इसका जवाब हाँ भी हो सकता है और नहीं भी, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वर्च्युअल संसार के समक्ष यह खतरा वास्तव में मंडरा रहा है, क्योंकि चीजें हर बार इतनी आश्वस्तकारी नहीं. कोई एस्टरायड आकर इंटरनेट प्रदान करने वाले उपग्रह से टकरा सकता है या कोई सोलर तूफान सारे कम्युनिकेशन सिस्टम को तहस—नहस कर सकता है, हो सकता है कि कोई खुराफाती हैकिंग ग्रुप सेंध लगाए और सारे सर्वरों को नष्ट करके अज्ञातवास में चल जाए, इंटरनेट प्रोवाइड कराने वाले गूगल के गुब्बारों की हवा निकल सकती है, कोई सुनामी या शार्कों की फौज महासागरों की तलहटी में बिछे 300 सबमैरीन कम्युनिकेशन केबलों के सिस्टम को डैमेज कर सकती है, जिनके माध्यम से 99 प्रतिशत डाटा प्रवाहित होता है. कुछ भी हो सकता है, क्योंकि हादसों को घटने के लिए वजह की नहीं,बल्कि मौके की दरकार होती है.

अब सबसे महत्वपूर्ण बात. बाकी लोगों ने जो तैयारियां की हैं, उन्हें एक तरफ रखते हुए सोचिए कि ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए आप खुद कितने तैयार हैं और क्या आप एक इंटरनेट विहीन संसार में जीने की कल्पना कर सकते हैं? अगर नहीं, तो यह आपके लिए चेतने का सही समय और उचित कारण है… आप अपनी तैयारियां शुरू कर दीजिए.

सबसे पहले तो उन चालीस फीसदी लोगों पर हँसना बंद कीजिए, जो इंटरनेट सुविधाओं तक पहुँच न होने के कारण अपने ज्यादातर कामों के लिए बाहर जाते हैं, लाइन में लगते हैं, भीड़ में कंधे छिलवाते हैं. इसके बजाए आप अपने कामों का चालीस फीसदी हिस्सा आॅफलाइन कीजिए. मोहल्ले के किराने वाले के पास जाइए, कुछ हिस्सा नगद लेन—देन कीजिए, बैंक जाकर चैक कैश कराइए, पोस्ट आॅफिस में जाकर चिट्ठियां पोस्ट कीजिए, कभी—कभी काउंटरों पर जाकर भी बिलों का भुगतान कीजिए, दोस्तों— परिजनों से व्यक्तिगत रूप से भी मिलिए, अपने जरूरी कागजातों की हार्ड कॉपी भी कहीं न कहीं फिजीकल फाइलों या फोल्डरों में सुरक्षित रखिए… और हफ्ते में कम से कम एक दिन डिजीटल फास्टिंग कीजिए. यानी कितना भी जरूरी हो, उस दिन इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करना है और उसी तरह से जीना है, जैसे इंटरनेट के आने से पूर्व जी सकते थे. मुश्किल है, चाहे तो इसे अपनी साठ पार वाली जेनरेशन की मदद से आसान बना सकते हैं, जो अपने अधिकतर काम इंटरनेट के बिना करने में सक्षम है. करके देखिए. कुछ दिनों बाद आप इसे भी उस तरह से एन्जॉय करना सीख जाएंगे, जितना इंटरनेट के साथ करते हैं.

यकीनन इससे डिजीटल डार्क एज का खतरा कम नहीं होगा… लेकिन हाँ, आप खुद को इसके असर के खतरों से जरूर बचा सकते हैं.

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