बैक टू रूट
स्वामी विवेकानंद के स्वप्नों की ओर लौटती युवा पीढ़ी
स्वामी विवेकानंद ने कहा था— "जिस राष्ट्र के युवा अपनी जड़ों से कट जाते हैं, वह अधिक दिन जीवित नहीं रह सकता।”
युवा दिवस पर जब हम वर्तमान पीढ़ी की ओर देखते हैं, तो एक सुखद बदलाव साफ़ दिखाई देता है। तेज़ रफ्तार, तकनीक और उपभोग की अंधी दौड़ के बीच अब नई पीढ़ी फिर से अपनी जड़ों की ओर लौटने लगी है। यह वापसी अतीत की ओर पलायन नहीं, बल्कि एक सुविचारित भविष्य की तैयारी है।
स्क्रीन से शब्दों की ओर
बीते वर्षों में मोबाइल और सोशल मीडिया ने सोचने की फुरसत छीन ली थी। लेकिन अब युवाओं की एक बड़ी संख्या युवा फिर से किताबों के साथ समय बिताने लगी है।साहित्य, इतिहास, दर्शन और आत्मविकास की पुस्तकों में उनकी बढ़ती रुचि यह दर्शाती है कि नई पीढ़ी केवल जानकारी नहीं, बल्कि बोध और दृष्टि चाहती है। विवेकानंद ने जिस “सोचने वाले युवा” की कल्पना की थी, उसकी झलक यहाँ दिखाई देने लगी है।
शरीर और मन—दोनों की देखभाल
आज की युवा पीढ़ी यह समझने लगी है कि सफलता केवल करियर से नहीं, स्वास्थ्य से भी जुड़ी है।योग, प्राणायाम, फिटनेस गतिविधियाँ और संतुलित पोषण पर बढ़ता ध्यान उसी भारतीय जीवन-दर्शन की ओर संकेत करता है, जहाँ शरीर को साधन और मन को दिशा माना गया है। यह वही संतुलन है जिसे विवेकानंद “पूर्ण मनुष्य” का आधार मानते थे।
वर्चुअल से रीयल रिश्तों की ओर
लगातार ऑनलाइन रहने के बाद नई पीढ़ी को यह एहसास होने लगा है कि स्क्रीन रिश्तों की जगह नहीं ले सकती।दोस्तों, परिवार और समाज के साथ उनका प्रत्यक्ष संवाद बढ़ रहा है। मेलजोल, चर्चा और सामूहिक गतिविधियाँ फिर से जीवन का हिस्सा बन रही हैं। यह सामाजिक पुनर्संयोजन किसी भी मजबूत राष्ट्र की पहली शर्त है।
पीढ़ियों के बीच संवाद की वापसी
जहाँ एक समय जेनरेशन गैप की बातें आम थीं, वहीं अब युवा वर्ग बुजुर्गों के अनुभवों को सुनने और समझने लगा है।दादा-दादी, बुज़ुर्गों की कहानियाँ और जीवन-दृष्टि आज प्रेरणा बन रही हैं। विवेकानंद ने भी भारतीय समाज की निरंतरता को उसकी पीढ़ीगत स्मृति में ही देखा था।
प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी
पर्यावरण संकट को सबसे गहराई से महसूस करने वाला वर्ग यही पीढ़ी है।पेड़ लगाना, प्लास्टिक से दूरी, जल संरक्षण और स्वच्छता जैसे प्रयास केवल अभियानों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा बनते जा रहे हैं। यह वही “प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व” का विचार है, जिसे भारतीय दर्शन सदियों से सिखाता आया है।
*खेती और परंपराओं की पुनर्खोज*
शहरों की चकाचौंध से बाहर निकलकर कई युवा खेती की ओर लौट रहे हैं।जैविक खेती, देसी बीज और पारंपरिक कृषि पद्धतियाँ फिर से अपनाई जा रही हैं। यह केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि भूमि, भोजन और जीवन के प्रति सम्मान की पुनर्स्थापना है।
साझी प्रगति की सोच
आज का नया भारत केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग पर भी विश्वास कर रहा है।कोऑपरेटिव बिजनेस मॉडल, स्वयं सहायता समूह और सामूहिक उद्यम उसी भारतीय परंपरा का आधुनिक रूप हैं, जहाँ लाभ के साथ लोककल्याण भी जरूरी माना गया।
आस्था और आत्मिक संतुलन
तेज़ जीवन की थकान के बीच नई पीढ़ी फिर से पूजा, ध्यान और अध्यात्म की ओर आकर्षित हो रही है। यह आस्था अंधविश्वास नहीं, बल्कि आत्मिक स्थिरता की खोज है। विवेकानंद ने कहा था—“धर्म वह है जो मनुष्य को निर्भय बनाता है।”आज के युवा में यह निर्भयता लौटती दिखाई देती है।
विश्वगुरु भारत की ओर
स्वामी विवेकानंद का सपना था— एक ऐसा भारत, जो अपनी आत्मा को पहचाने और दुनिया को मार्ग दिखाए।जड़ों से जुड़ा, संवेदनशील, स्वस्थ और जिम्मेदार युवा वर्ग उस स्वप्न को साकार करने की सबसे बड़ी शक्ति है।
निष्कर्ष
“बैक टू रूट” का अर्थ पीछे जाना नहीं, बल्कि अपनी पहचान के साथ आगे बढ़ना है।आज युवा मानस में धीरे - धीरे आ रहे जिस बदलाव को हम महसूस कर रहे हैं, उसे देखते हुए यह स्पष्ट है कि नई पीढ़ी सस्टेनेबल लिविंग, मानवीय रिश्तों और सांस्कृतिक चेतना को अपनाकर भारत के भविष्य को नई दिशा देने के लिए तैयार है।
डॉ. संदीप अग्रवाल