इलाहाबाद हाई कोर्ट का विवादास्पद आदेश: छाती पर हाथ रखना और नाड़ा खोलना रेप की श्रेणी में नहीं
भारत के लोगों का कोर्ट में काफी विश्वास है. अगर किसी के साथ कुछ गलत हुआ है तो वो न्याय के लिए इसी कोर्ट पर आश्रित हो जाता है. कोर्ट में जज भी मामले के हर पहलु को देखते हुए ही किसी केस पर सुनवाई करते हैं. लेकिन कई बार कुछ मामलों में ऐसे फैसले लिए जाते हैं, जिसके बाद बवाल मच जाता है. इन दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ऐसे ही फैसले ने बवाल मचाया हुआ है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक नाबालिग के साथ कथित बलात्कार के केस पर जज ने ऐसा बयान दिया, जिसके बाद बहस छिड़ गई. दो लड़कों ने एक नाबालिग लड़की के साथ छेड़खानी की थी. पवन और आकाश नाम के इन आरोपितों ने नाबालिग के निजी अंग छुए थे. इसके बाद पायजामा खोल दिया था. गनीमत थी कि आसपास के लोगों ने बच्ची की चीख सुन ली और उसे बचा लिया. इसके बाद दोनों आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज करवाया गया था, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 18 के तहत मुकदमे दर्ज किए गए थे. लेकिन आरोपियों ने अपने ऊपर लगी धाराओं के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की थी.
क्या कहा कोर्ट ने?
आरोपियों द्वारा दायर की गई याचिका पर कोर्ट के जज ने टिप्पणी करते हुए कहा कि दोनों के खिलाफ रेप के केस नहीं दर्ज किये जा सकते. उन्होंने सिर्फ नाबालिग की छाती को छुआ था और उसके पायजामे की डोर खोली थी. जब राहगीरों ने उन्हें पकड़ा तो उन्होंने नाबालिग को छोड़ दिया. ऐसे में बलात्कार हुआ ही नहीं. इस स्थिति में रेप का केस बनता ही नहीं है.
मच गया बवाल
हाई कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद बवाल मच गया है. कई सामाजिक संगठन इस टिप्पणी के खिलाफ उतर आए हैं. सबका यही कहना है कि क्या नाबालिग की छाती को छूना और नाड़ा खोलना इस बात का प्रमाण नहीं है कि अपराधियों की क्या थी. वो लड़की की किस्मत थी कि लोगों ने उसे बचा लिया वरना उसके साथ दुष्कर्म होना तय था. ऐसे में आरोपियों को यूं ही रेप के इल्जाम से मुक्त करना समाज में एक बहुत गलत संदेश देगा.
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