उपहार में मिले करोड़ों पर कोई टैक्स नहीं, मुंबई अपीलीय प्राधिकरण ने दिया हरी झंडी
व्यापार: मुंबई की अर्चना ने जब 98.70 लाख रुपये की आय घोषित करते हुए 2018-19 के लिए आयकर रिटर्न (आईटीआर) दाखिल किया तो उन्हें कर नोटिस जारी किया गया। इस नोटिस का कारण यह था कि मूल्यांकन कार्यवाही के दौरान आयकर निर्धारण अधिकारी (एओ) ने पाया कि अर्चना ने अपने खाते में 89 लाख की नई नकदी जमा की थी। अर्चना ने बताया, यह नकदी उनके करीबी रिश्तेदारों ने तोहफे में दिया। वह आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 56(2)(7) के तहत रिश्तेदार की परिभाषा पूरी करती हैं। अर्चना ने कहा, उन्हें धनराशि देने वाले रिश्तेदारों की विस्तृत सूची उनके पैन नंबर सहित दी गई है। हालांकि, आयकर विभाग संतुष्ट नहीं हुआ।
आयकर विभाग ने दिया टैक्स भरने का नोटिस
कर अधिकारी ने अर्चना के दिए गए साक्ष्यों का विश्लेषण किया। यह उपहार देने वालों की साख पर संदेह करने पर केंद्रित था। उनका कहना था कि गिफ्ट देने वालों की घोषित आय बहुत कम थी। उन्होंने उपहार के लिए तीसरे पक्ष से रकम ली थी। ऐसे में उपहार वास्तविक नहीं थे। इसलिए 89 लाख रुपये पर टैक्स चुकाने का आदेश दिया गया। टैक्स विभाग के इस फैसले के खिलाफ अर्चना ने अपील आयुक्त के समक्ष अपील दायर की। 27 जनवरी, 2025 को वह मुकदमा हार गईं। इसके बाद उन्होंने आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) मुंबई में अपील दायर की, जहां 25 अगस्त को मुकदमा जीत लिया।
आईटीएटी ने कहा, पारदर्शी है रकम का सोर्स
आईटीएटी मुंबई ने बताया, अर्चना के साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि धारा 68 के तहत सभी मूलभूत शर्तें, मतलब ऋणदाता की पहचान, साख और लेनदेन की वास्तविकता पूरी होती हैं। रकम का सोर्स पारदर्शी है। दानकर्ताओं के बैंक में जमा राशि को तुरंत अर्चना को उपहार के रूप में ट्रांसफर कर दिया गया। इस साक्ष्य और बैंक खाते के विवरण के संबंध में विपरीत निष्कर्ष की गुंजाइश नहीं है। अर्चना ने बताया पूंजी का एक बड़ा हिस्सा कुछ करीबी रिश्तेदारों से मिले उपहारों का था। ये रिश्तेदार आयकर कानून की धारा 56(2)(7) के तहत रिश्तेदारों की परिभाषा में आते हैं।
रिश्तेदारों से मिले उपहार पर टैक्स नहीं
आईटीएटी ने स्पष्ट किया, रिश्तेदारों से मिले उपहार टैक्स के दायरे में नहीं आते हैं। उपहार देने वाले दूर के रिश्तेदार या तीसरे पक्ष नहीं हैं, बल्कि अर्चना के निकटतम पारिवारिक सदस्य हैं। ये आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 56(2)(ए) के प्रावधान में निहित रिश्तेदारों की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं।
टैक्स लगाना अनुचित
दान देने वाला पहचान का है। उन पर टैक्स लगाया जाता है। सभी लेनदेन पारदर्शी और सामान्य बैंकिंग माध्यम से हुए हैं। ऐसे हालात में किसी भी तरह का टैक्स लगाना अनुचित होता है। -गौरव कुमार, टैक्स विशेषज्ञ
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