नई सोच, समस्या समाधान की क्षमता और तकनीक का सही उपयोग ही आपको आगे बढ़ाएगा: डॉ. पेठे

राहुल जी, सबसे पहले तो यही बताएं कि नवाचार, यानि इनोवेशन को आप किस तरह परिभाषित करते हैं?
इनोवेशन जो है, वो एक कल्पना है आपकी सोच है. और किसी भी सोच को आकार दिया जा सकता है. और एक स्वरूप देने के बाद आप इसे मार्केट में ला सकते हैं. भारत सरकार कहें, या दूसरे देशों की सरकारें कहें, उन्होंने भी इनोवेशन को इसी रूप में स्वीकार किया है कि अपनी सोच को आकार देने के बाद उसे आप बाजार में ले जाएं और बाजार की जो जरूरत है उसे पूरा करें.

इनोवेशन के साथ अक्सर एक त्रासदी होती है कि आप कोई चीज सोच रहे होते हैं और देश के या दुनिया के किसी और कोने में कोई और उसी सोच को लेकर आगे निकल जाता है और आप सोचते रह जाते हैं... इस स्थिति से कैसे बचा जा सकता है?
बात सही है. ऐसा होता है. लेकिन, ऐसा न हो, इसके लिए आप जब कुछ सोचते हैं तो आपको चाहिए कि दूसरों को उसके बारे में बताने से पहले प्रॉपर तरीके से रिक्वायर्ड ड्राफ्टिंग करें, और वो रिक्वायर्ड ड्राफ्टिंग पेटेंट फाइल करें. पेटेंट कराने से वह चीज आपके नाम से बीस साल के लिए आ जाती है. उसके बाद ही आप लोगों को बताइएं. क्योंकि अगर आपने पहले ही दूसरों को बता दिया तो उनके पास रिसोर्सेज हैं, बाकी चीजें हैं. वे आपके ही आइडिया में एडआॅन करके आगे निकल जाएंगे और आप पीछे रह जाएंगे.
इनोवेशन को लेकर अक्सर लोगों की, खासकर इन्वेस्टरों की यह शिकायत रहती है कि बहुत सारे युवा डीआईवाई यूट्यूब वीडियो देख—देखकर चीजें बना लेते हैं और उसे दिखाकर खुद को इनोवेटर कहने लगते हैं... इस आरोप में कितनी सच्चाई है?
और इनोवेटर को कैसे पता चलेगा कि वह स्टैंडर्ड तरीका क्या है?

देखिए, अभी तक मेरे साथ जितने भी स्टुडेंट जुड़े हैं, मेरा उनसे यही कहना रहा है कि आप सिर्फ प्रोजेक्ट मत बनाइए. प्रोजेक्ट केवल एकेडेमिक सबमिशन के लिए होता है. मैं उन्हें समझाता हूॅं कि मार्केट रिक्वयरमेंट के हिसाब से प्रॉडक्ट बनाइए. वो बनाने के बाद उसका प्रॉब्लम स्टेटमेंट तैयार कीजिए और उसका रिक्वायमेंट कहॉं पर है, वह ढूंढिए. उसकी मार्केटिंग कहॉं हो सकती है, यह ढूंढिए. उसके कस्टमर कौन हो सकते हैं, ये एक्सप्लोर कीजिए. अगर मैं उन्हें सिर्फ एकेडेमिक सबमिशन के लिए प्रोजेक्ट बनाना सिखाता हूॅं तो यह उनके लिए गलत हो जाएगा. मैं उन्हें मार्केट तक लेकर जाना चाहता हूॅं. इसलिए इनोवेटर्स को मार्केट रिक्वायरमेंट के हिसाब से चीजें डेवलप करने के लिए प्रेरित करता हूॅं. उदाहरण के लिए, हमने इसरों के पास डिबरी कलेक्शन के लिए एक प्रोजेक्ट सबमिट किया था. इसी तरह सोलर पैनल हैं, जिनकी क्लीनिंग एक बड़ी समस्या है. हमने इसके समाधान के बारे में सोचा और एक प्रॉडक्ट डेवलप किया, जो आॅटोमेटिक और नॉनआॅटोमेटिक दोनों टाइप का है. आॅटोमेटिक में भी वाइफाई बेस और टाइमर बेस, दो कैटेगरी हैं. इसे हम मार्केट में ले जाकर ही प्रोसेस करते हैं, खुद ही इन्स्टॉल करके देते हैं. ये स्टुडेंट्स का प्रॉडक्ट है, जो सोलर केयर के नाम से पूरे इंडिया में फैल चुका है. ऐसे ही प्लांट केअर करके एक और इनोवेशन को प्रॉडक्शन में बदला. ऐसे कई स्टुडेंट्स हैं, जिन्हें इन्वेस्टर ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ी. उन्होंने खुद ही प्रॉडक्शन स्टार्ट किया और लोगों को देना शुरू किया. ये उदाहरण बताते है कि अगर हम बच्चों को सही तरह से गाइड करें, सही राय दें तो वे सच में अपनी पोजीशन, अपने रिसोर्सेज को, अपने आइडिया को प्रॉपर तरीके से इस्तेमाल कर टार्गेट अचीव कर सकता है.

अगर मैं मार्केट तक पहुॅंचने की बात करता हूॅ तो इसके लिए बहुत सारे रिसोर्सेज उपलब्ध हैं. लेकिन, कम्प्लाइंसेज में अगर मैं बात करता हॅं तो इसमें बहुत सारी चीजें हैं. जैसे रुल्स एंड रेगुलेशंस हैं, फाइलिंग है, लाइजनिंग प्रोसेस होती है. जैसे कि पेटेंट की फाइलिंग... ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं होता कि यह कैसे होती है. मै कोई अटॉर्नी या एजेंट नहीं हूॅं. सिर्फ लोगों की मदद करता हूॅं ड्राफ्टिंग, फाइलिंग, पब्लिकेशन, ग्रांटिंग, हियरिंग, एग्जामिनेशन में...हर लेवल पर. इसी तरह जिन स्टुडेंट्स का प्रॉडक्ट मुझे प्रॉमिसिंग लगता है, तो उसके लिए मैं उन्हें गाइड करता हूॅं कि कहॉं तक जाना है, कस्टमर्स के साथ डील कैसे करना है, बार्गेन कैसे करना है, उन्हें सॉल्यूशन किस तरह से प्रोवाइड कराना है, इस तरह की चीजें जब वे खुद जाकर करते हैं तो इससे उन्हें बाजार का व्यावहारिक अनुभव मिलता है. मैं ये बोलना चाहता हॅूं कि एजुकेशन सिस्टम में अगर मैं बुकिश नॉलिज देने के साथ साथ अगर मैं उन्हें प्रैक्टिकल नॉलिज भी देता हूॅं तो इससे उनमें परिपक्वता आती है और उन्हें आगे बढ़ने में काफी मदद मिलती है.
आज का युवा केवल देश का भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान की सबसे बड़ी शक्ति है। मैं युवाओं से यही कहना चाहूँगा कि बड़े सपने देखिए, लेकिन उन सपनों को मेहनत, अनुशासन और नवाचार के माध्यम से वास्तविकता में बदलने का साहस भी रखिए। आज के समय में केवल डिग्री प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि नई सोच, समस्या समाधान की क्षमता और तकनीक का सही उपयोग ही आपको आगे बढ़ाएगा। जब भी आप किसी समस्या को देखें, तो केवल उसकी चर्चा न करें, बल्कि उसका समाधान खोजने का प्रयास करें। यही सोच एक विद्यार्थी को इनोवेटर, रिसर्चर और सफल उद्यमी बनाती है।
अपने विचारों को केवल नोटबुक तक सीमित न रखें। उन्हें प्रोटोटाइप, प्रोडक्ट और स्टार्टअप के रूप में विकसित करें। रिसर्च कीजिए, पेटेंट फाइल कीजिए, नई तकनीकों पर कार्य कीजिए और ऐसा समाधान तैयार कीजिए जो समाज और उद्योग दोनों के लिए उपयोगी हो। युवा शक्ति में दुनिया बदलने की क्षमता है। यदि आपका लक्ष्य स्पष्ट हो, सीखने की इच्छा निरंतर हो और मेहनत ईमानदारी से की जाए, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती। हमेशा सकारात्मक सोच रखें, असफलताओं से सीखें और अपने ज्ञान का उपयोग समाज और राष्ट्र के विकास के लिए करें।
मेरा संदेश केवल इतना है —“सीखते रहिए, सोचते रहिए, नवाचार करते रहिए और अपने विचारों को प्रभावशाली परिणामों में बदलते रहिए।”
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