27% आरक्षण पर हाई कोर्ट सुनवाई, न्यायिक प्रक्रिया 15 मई तक चलेगी
जबलपुर। मध्यप्रदेश में पिछले सात वर्षों से कानूनी पेचीदगियों में उलझे 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के संवेदनशील मामले पर जबलपुर हाईकोर्ट ने अंतिम सुनवाई की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है। माननीय न्यायालय ने आगामी 15 मई तक इस प्रकरण पर प्रतिदिन नियमित रूप से अंतिम दलीलें सुनने का निर्णय लिया है, ताकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित तीन माह की समय सीमा के भीतर इस पर अंतिम फैसला सुनाया जा सके। सुनवाई के पहले दिन मुख्य रूप से उन पक्षों के तर्कों को सुना गया जो आरक्षण की सीमा बढ़ाए जाने का विरोध कर रहे हैं, जिन्होंने शीर्ष अदालत द्वारा पूर्व में निर्धारित 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा का हवाला देते हुए अपनी बात रखी।
अदालती कार्यवाही और कानूनी तर्कों का दौर
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव कुमार सचदेवा की खंडपीठ इस महत्वपूर्ण विषय पर कल दोपहर 3 बजे से पुनः सुनवाई जारी रखेगी। पहले दिन की कार्यवाही के दौरान विरोध पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि आरक्षण का दायरा बढ़ाना सुप्रीम कोर्ट के पुराने दिशा-निर्देशों का उल्लंघन हो सकता है। न्यायालय अब लगातार इस मामले के हर कानूनी पहलू को परख रहा है ताकि वर्षों से लंबित इस विवाद का तार्किक और संवैधानिक समाधान निकाला जा सके। चूंकि इस फैसले का सीधा असर प्रदेश की हजारों सरकारी भर्तियों और युवाओं के भविष्य पर पड़ने वाला है, इसलिए अदालत इस बार बेहद त्वरित गति से दलीलें सुनकर फैसले की ओर बढ़ रही है।
हक की मांग को लेकर ओबीसी उम्मीदवारों का बड़ा प्रदर्शन
न्यायालय में चल रही सुनवाई के बीच जबलपुर की सड़कों पर ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थियों का भारी आक्रोश और दर्द भी देखने को मिला। प्रदेश के लगभग 50 जिलों से आए सैकड़ों उम्मीदवारों ने एक विशाल रैली निकालकर अपनी मांगों को बुलंद किया, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं अपने छोटे बच्चों को गोद में लेकर चिलचिलाती धूप में शामिल हुईं। प्रदर्शनकारी अभ्यर्थी हाईकोर्ट परिसर स्थित महाधिवक्ता कार्यालय पहुंचकर अपनी बात रखना चाहते थे, हालांकि सुरक्षा कारणों से उन्हें रोक दिया गया। इन युवाओं का मुख्य रूप से यही कहना है कि 13 प्रतिशत आरक्षण को होल्ड पर रखने से उनका करियर अधर में लटका हुआ है, अतः सरकार की ओर से कोर्ट में पुख्ता पैरवी की जानी चाहिए।
साल 2019 से जारी कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि
मध्यप्रदेश में आरक्षण का यह विवाद साल 2019 में तब शुरू हुआ था जब तत्कालीन सरकार ने ओबीसी कोटे को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का निर्णय लिया था। इस फैसले को तुरंत हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जिसके बाद बढ़े हुए आरक्षण के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी गई थी। यह लंबी कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंची, लेकिन अंततः देश की सबसे बड़ी अदालत ने इस मामले को वापस मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को सौंपते हुए एक निश्चित समय सीमा के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया। अब सबकी निगाहें 15 मई तक चलने वाली इस निरंतर सुनवाई पर टिकी हैं, जो प्रदेश की राजनीति और सामाजिक दिशा तय करने में निर्णायक साबित होगी।
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