लकीरों में छिपी तकदीर
प्रख्यात हस्तरेखा विशेषज्ञ, पं. आर.एन.मिश्रा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. वर्तमान में म.प्र. की राजधानी भोपाल में रह रहे पंडित जी की मूल जड़े वाराणसी में हैं. ज्योतिष की अपनी पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए वह पिछले तीस वर्षों में तीस हजार से ज्यादा हाथों का अध्ययन कर चुके हैं, जिनसे संबंधित अनुभवों के सार को उन्होंने अपनी नेचर से फ्यूचर तक नामक पुस्तक में संकलित किया है. हाल ही में वह संपर्क और संवाद, वरिष्ठ आयकर अधिकारी श्री संजय अग्रवाल द्वारा संचालित एक अनौपचारिक समूह, द्वारा आयोजित विशेषज्ञ से संवाद नामक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए थे. इस मौके पर खबर नेक्स्ट की ओर से डॉ. संदीप अग्रवाल ने हस्तरेखा और ज्योतिष विज्ञान से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर उनके साथ एक लंबी चर्चा की. इस बातचीत के प्रमुख अंश यहॉं प्रस्तुत हैं:
मिश्रा जी, सबसे पहले तो यही बताएं कि हस्तरेखा विज्ञान में आपकी रुचि कब और कैसे उत्पन्न हुई?
देखिए, हमारे परिवार का जो बैकग्राउंड है, वह किसी जमाने में ज्योतिष का ही रहा हे. हमारे परदादा वाराणसी के थे और उस समय वहॉं जो शासन था, उसमें उनकी अच्छी पैठ थी. एक तरह का उन्हें राजज्योतिषि का दर्जा प्राप्त था. दादा जी थे, लेकिन उनका लोगों में कुछ विशेष नहीं था. फिर हमारे पिता जी शासकीय सेवा में थे, इसलिए इस विधा को लेकर उनका भी पब्लिक अपीयरेंस नहीं के बराबर ही था. लेकिन, हमारे घर में ज्योतिष की काफी किताबें रखी हुई थीं. मेरे हाथ एक किताब आ गई, जो हस्तरेखा पर थी. हालांकि मुझे किसी ने बोला तो नहीं था, लेकिन मैंने वो किताब पढ़ी और वह मुझे अच्छी लगी. उस समय मैं हायर सेकेंडरी में पढ़ रहा था. मुझे पढ़ने में तो किताब अच्छी लगी, लेकिन जब उसे व्यवहार में देखना चाहा तो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया.
बीच में छोड़ा, फिर पढ़ा, फिर छोड़ा... तो चीजें चलती रहीं. लेकिन, जब आप किसी फील्ड में आगे बढ़ते हैं तो आपको धीरे—धीरे उस फील्ड के बारे में आॅथेंटिक जानकारियॉं मिलना आरंभ हो जाती हैं. मुझे अंग्रेजी में लिखी गई एक ऐसी किताब मिली, जिसे हम इस विधा की टेक्स्टबुक कह सकते हैं. उसे मैंने कोर्स की किताब की तरह पढ़ी तो मुझे इसकी अच्छी रूपरेखा मिली और मैं धीरे—धीरे इस क्षेत्र में काफी आगे निकल गया और फिर मैंने खुद अपनी दो किताबें लिखीं, जो प्रकाशित हुई हैं.
इसके अलावा मैंने नवभारत, एब्स्ल्यूट इंडिया, दैनिक भास्कर आदि पत्र—पत्रिकाओं में लेख लिखना शुरू कर दिया. मैं हफ्ते में कुछ दिन, फर्स्ट हाफ में इसका परामर्श भी देता हूॅं. मैं दिन के साफ उजाले में हाथ देखना प्रीफर करता हूॅं. मैं कुछ आॅनलाइन और आॅफलाइन क्लासेज भी लेता हूॅं. क्योंकि मेरा मानना है कि अगर आपको इस फील्ड में वास्तव में कुछ ऐसा देना है, जिससे समाज का भला हो तो इसके लिए जरूरी है कि कुछ अच्छे लोग इस विधा में आएं. इसके लिए मैं लोगों को सिखाता भी हूॅं, जिसके लिए इसके सिद्धांतो को पढ़ना, समझना और उन्हें अपने व्यवहार में शामिल करना जरूरी होता है. तो इस तरह मेरा यह क्रम चल रहा है.
जिस तरह से कुंडली ज्योतिष में केपी पद्धति, पाराशर पद्धति आदि विभिन्न पद्धतियों का चलन है, क्या इसी प्रकार पामिस्ट्री में भी अलग—अलग तरह के स्कूल हैं?
हॉं, इसमें भी अलग—अलग स्कूल हैं, जैसे इंडियन स्कूल है, वेस्टर्न स्कूल है, इजिप्शियन स्कूल भी है. लेकिन हमारे देश में इंडियन और वेस्टर्न का मिला—जुला रूप ज्यादा देखने को मिलता है. इसमें ज्यादातर चीजें तो वैसी ही होती हैं लेकिन इंडियन स्कूल में चिन्हों को बहुत ज्यादा महत्व दिया जाता है. थोड़ी बहुत चीजें अलग होती हैं, लेकिन सबका ध्येय एक ही होता है, किसी भी तरह से संकेतों को डिकोड करना. हर विधा अपने—अपने तरीके से इस काम को करती है.
बहुत से हस्तरेखा विशेषज्ञ स्त्रियों का बॉंया हाथ देखते हैं, पुरुषों का दायां. क्या इसका कोई वैज्ञानिक आधार है या यह अपनी—अपनी शैली की वजह से है?
देखिए आज से चार सौ साल पहले जो किताबें लिखी गई हैं, उनमें महिलाओं को बॉंये हाथ से देखा जाता था और पुरुषों का दाहिना. इसके पीछे भी अपना एक लॉजिक है. पुराने समय में जो स्त्रियॉं होती थीं, वो डिपेंडेंट होती थीं. बचपन में पिता पर, विवाहोपरांत पति पर और फिर वृद्धावस्था में पुत्रों पर...उन लोगों का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था. और उनके विचार भी स्वतंत्र नहीं होते थे. ऐसे निर्भर लोगों का बॉंया हाथ देखा जाता है. आज भी, अगर कोई दूसरों पर डिपेंडेंट है, भले ही वह मेल हो या फीमेल, उसका बॉंया हाथ ही देखा जाना चाहिए. और जो स्वतंत्र है, स्त्री हो या पुरुष हो, उसका दाहिना यानि एक्टिव हाथ देखा जाना चाहिए. आज परिस्थितियॉं बदल गई हैं. महिलाएं भी आत्मनिर्भर हैं, स्वतंत्र निर्णय ले रही हैं. हर वह व्यक्ति जो स्वयं पर निर्भर है, खुद फैसले ले सकता है, उसका दायां हाथ ही देखना चाहिए.
क्या कभी ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति के दोनो हाथों को देखने पर उसके बॉंए हाथ की रेखाएं उसके व्यक्तित्व और भविष्य के बारे में कुछ और बता रही हों और दाएं हाथ की रेखाएं कुछ और ?
हॉं, होता है. देखिए, हमारा जो बॉंया हाथ है, उसका संबंध हमारे एनसेस्टर्स, जेनेटिक, पास्ट आदि फिक्स्ड गुणों से होता है और हमारा दायां हाथ वह हमारा वर्तमान और भविष्य से जुड़ा होता है. इस तरह से हमारा लेफ्ट हैंड पैसिव होता है और राइट हैंड एक्टिव. कह सकते हैं कि हमारा लेफ्ट हैंड प्रोवीजन और राइट हैंड अलॉटमेंट को. बॉंया हाथ हमारे भीतर के गुण—अवगुण को दर्शाता है, और दाहिने हाथ से हमें पता चलता है कि हमने इन गुणों को कितना बढ़ाया है या अवगुणों का कितना कंट्रोल किया है. तो अगर किसी का लेफ्ट हैंड अच्छा नहीं है और राइट हैंड में रेखाएं अच्छी हैं तो इसका मतलब यह है कि उसे बहुत अच्छा वातावरण मिला है, उसने अपनी विलपॉवर का अच्छा इस्तेमाल किया है और अपनी पुरानी कमियों को काफी हद तक ठीक है. और अगर उसका बॉंया यानि पैसिव हैंड अच्छा है और राइट यानि एक्टिव हैंड अच्छा नहीं है तो इसक अर्थ है कि उसने अपनी प्रतिभा का पूरा उपयोग नही किया है. लेफ्टहैंडर लोगों के मामले में इसका उलट हो सकता है.
कुछ लोग मानते हैं कि मनुष्य स्वयं अपना भाग्यनिर्माता है और हाथ की रेखाएं समय—समय पर बदलती रहती हैं. वहीं दूसरी ओर यह भी माना जाता है कि हमारे जीवन का हर पल, हर क्षण निश्चित है, पूर्व निर्धारित है. तो क्या किसी की रेखाएं बदलने के साथ—साथ उसका भाग्य या भविष्य भी बदल जाता है?
देखिए, ऐसा है कि रेखाएं निश्चित रूप से परिवर्तनशील हैं. लेकिन, हमारे जो फिंगरप्रिंट हैं वे यूनिक होते हैं और कभी बदलते नहीं हैं. फिंगरप्रिंट में हमारे पूर्वज जो हैं, उनके गुण छिपे होते हैं, जो हमें आनुवंशिक तौर पर मिलते हैं. उनके साथ हमें जो साइक्लोजिकल चीजें मिलती हैं, वो बदली नहीं जा सकतीं. लेकिन हमारी लाइनें परिवर्तनशील हैं, जो हमारी शिक्षा, हमारा वातावरण, हमारे संस्कार, हमारी संगति किस तरह की है, इससे बहुत अधिक प्रभावित होती हैं. इसे देखते हुए हम कुछ हद तक अपने भाग्य के निर्माता बन जाते हैं.
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए एक और सवाल. अगर आप अध्येता की दृष्टि से देखें तो एक आदमी जो दस साल पहले आपको अपना हाथ दिखा चुका है और आज फिर से आपको अपना हाथ दिखाता है तो इस बात की कितनी संभावनाएं हैं कि आपका नया आकलन, पुराने आकलन से अलग निकले?
संभावना है कि दस साल के अंतर से किए गया आकलन पूर्व आकलन से अलग हो. क्योंकि जैसा अभी हमने चर्चा की कि हाथ की रेखाएं परिवर्तनशील हैं. और अगर हमारे लगातार प्रयास रहे हैं, हमारा वातावरण बदला है तो हस्तरेखाओं में भी बदलाव आता है. और जब ये बदलती हैं तो व्यक्ति के स्वभाव में भी बदलाव आता है. और अगर स्वभाव में बदलाव आता है तो जैसा कि कहा जाता है, व्यक्ति का नेचर उसका फ्यूचर डिसाइड करता है, इसलिए हो सकता है कि कई—कई लोगों के दस साल पहले के हाथ और दस साल के बाद के हाथ में काफी अंतर देखने को मिले.
यदि हम एक जातक की दृष्टि से देखें तो हमें कुंडली के निष्कर्षों पर ज्यादा विश्वास करना चाहिए, या हस्तरेखाओं के निष्कर्षों पर?
देखिए, कुंडली और हस्तरेखा, दोनों ही अलग—अलग विधा हैं. हस्तरेखा से आप बहुत लंबे समय का निश्चित प्रिडिक्शन नहीं कर सकते हैं... दो—तीन चार—पॉंच साल तक का अच्छे से कर सकते हैं, लेकिन आगे का सिर्फ अनुमान लगा सकते हैं. अलबत्ता, अगर उस व्यक्ति की जिंदगी में कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आता तो आप हस्तरेखाओं से भी बहुत दूर तक के समय का अनुमान लगा सकते हैं.
कुंडली दिखाकर भविष्य जानने वालों को अक्सर यह अनुभव होता पाया गया है कि अलग—अलग ज्योतिषियों का एक ही कुंडली को लेकर अलग—अलग निष्कर्ष निकला है, सही आकलन में चूक भी हुई है. हस्तरेखाओं से प्राप्त निष्कर्षों में इस तरह की चूक की कितनी गुंजाइश होती है?
देखिए, जैसा अभी हमने हस्तरेखाओं के बारे में बताया, इनसे हमें व्यक्ति के स्वभाव के बारे में, उसकी हेल्थ के बारे में, उसके प्रोफेशन के बारे में जानकारी मिलती है. हमारी हाथ की रेखाओं, उसकी बनावट को देखते हुए हम व्यक्ति के लिए क्या अच्छा है, बताने का प्रयास करते हैं. एक तरह से जो हस्तरेखाएं हैं, वे बड़ी वास्तविक बातों पर आधारित है. इससे बहुत लॉजिकल निष्कर्ष दिया जा सकता है कि आपकी जो वर्तमान स्थिति है, वो आपके किस गुण या अवगुण के कारण ऐसा हुआ है, जो घटनाएं हो रही हैं वे आपके स्वभाव की किन बातों की वजह से हो रही हैं, इस प्रकार की व्याख्या, हस्तरेखाओं के माध्यम से ज्यादा बेहतर तरीके से हो सकती है. हस्तरेखाएं ज्यादा तार्किक भी हैं. मान लीजिए कि कुंडली से कोई चीज निकाल कर आपने किसी को बता दिया, लेकिन जब तक उसके पीछै के तर्क आप नहीं बताएंगे तो आज की पीढ़ी, इस पर ज्यादा विश्वास नहीं करेगी. हस्तरेखाओं के निष्कर्ष ज्यादा वैज्ञानिक कहे जा सकते हैं, क्योंकि ये व्याख्याओं पर आधारित हैं.
आप अभी तक 30 से 35 हजार हाथ देख चुके हैं. क्या कोई ऐसा हाथ, जो आपको हमेशा के लिए याद रह गया हो?
हाथों में तो यही यूनिक हो सकता है कि किसी हाथ में रेखाएं बहुत ज्यादा हों, या बहुत ही कम हों. जहॉं रेखाएं कम होती हैं, वहॉं व्यक्ति का व्यवहार, जीवन लगभग फिक्स रहता है. लेकिन, जहॉं ये बहुत ज्यादा होती हैं, उस व्यक्ति का जीवन तेजी से बदलता रहता है. कुछ हाथों की रेखाओं वाले व्यक्ति में गुस्सा इतना ज्यादा होता है कि वह सामने वाले की जान तक ले सकता है, या किसी की रेखाओं से पता चलता है कि उसे ऐसी बीमारी हो सकती है कि उसकी जान न बचाई जा सके... तो इस तरह के बहुत से हाथ हमने देखे हैं. वहीं बहुत सारे ऐसे हाथ भी देखें हैं कि व्यक्ति में बहुत ज्यादा संभावनाएं हैं, लेकिन उनका पता न चल पाने की वजह से वह सालों तक अपनी क्षमताओं का उपयोग नहीं कर पाया. लेकिन, जब वह हमारे संपर्क में आया तो हमने उसे बताया कि उसमें क्या—क्या गुण हैं, जिनका उपयोग करके वह तेजी से विकास कर सकता है और अपने काम को एन्जॉय कर सकता है.
इसी से संबंधित एक और प्रश्न है, हमारे यहॉं कहा जाता है कि सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् यानि ऐसा सत्य बोलो, जो प्रिय भी हो. क्या आपके सामने कोई ऐसा हाथ आया, जब आप चाहकर भी हाथ दिखाने वाले को सच न बता पाए हों?
ये हुआ है और फेलियर भी सब जगह होते हैं. मैं ये नहीं कहता कि जो भी हाथ मैंने देखे हैं, मैंने जो एनेलेसिस किया है वह हंड्रेड पर्सेंट एकुरेट हो. लेकिन, हम इसका पूरा प्रयास करते हैं कि तभी निष्कर्ष बताते हैं, जब पूरी तरह से कॉन्फिडेंट होते हैं. जिसके लिए हम तीन—चार चीजों का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं. इसके अलावा निष्कर्ष बताते हुए और कुछ चीजें हैं, जिनका काफी ख्याल रखना पड़ता है. जैसे कि मृत्यु को लेकर कोई चीज सामने आती है, तो ज्योतिष का सिद्धांत है कि डेथ कभी प्रेडिक्ट नहीं करना चाहिए. क्योंकि मृत्यु से संबंधित कई चीजें हैं, जिनकी वजह से मृत्यु टल सकती है, जैसे ईश्वर की कृपा है और बहुत सारे फैक्टर्स हैं, जिनकी वजह से व्यक्ति मृत्यु से बच जाता है. हमारे शास्त्रों में लिखा है कि मृत्यु कई प्रकार की होती है, जैसे अंग—भंग हो जाए, या चरित्र नष्ट हो जाए तो वह भी एक प्रकार की मृत्यु ही है. इसलिए, मृत्यु जैसी चीजों पर, अगर हमें दिखाई भी दे रहा है कि उसका जीवन कम है तो भी जीवित व्यक्ति को उसकी आसन्न मृत्यु के बारे में बताना वर्जित माना जाता है. उसे कहने का कोई आशय भी नहीं है और इसका सामने वाले पर काफी मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है, जिसकी वजह से उसका रोजमर्रा का जीवन भी काफी डिस्टर्ब हो सकता है.
अच्छा ये बताएं कि हस्तरेखाओं में कितना विज्ञान है और कितना अनुभव और अध्ययन?
देखिए, हस्तरेखाओं के अध्ययन में जब से फिंगर प्रिंट एनेलेसिस आ गया है और साइक्लॉजिस्टों ने भी हस्तरेखाओं के महत्व को स्वीकार किया है. कई साल पहले केरल के जो स्वास्थ्य मंत्री थे, उन्होंने कई डॉक्टरों को छह—छह महीने की ट्रेनिंग दी थी और हस्तरेखाओं का अध्ययन सिखाया था, ताकि कैंसर और ऐसे कई दूसरे गंभीर रोगों का समय रहते डायग्नॉसिस किया जा सके. निश्चित रूप से हस्तरेखाओं का अध्ययन मेडिकल साइंस में बहुत मदद कर सकता है, लेकिन इसके लिए हमारे वैज्ञानिको और डॉक्टरों को ओपेन माइंड होना पड़ेगा. इससे बहुत सारे गंभीर रोगों की रोकथाम की जा सकेगी, जिससे समाज का भी काफी भला होगा. इस तरह के बहुत सारे रिसर्च सामने आ रहे हैं, जो 90—95 पर्सेंट से अधिक की एकुरेसी की पुष्टि करते हैं. इसकी वजह से यह एक विज्ञान के रूप में उभरा है, बाकी अध्ययन—मनन और इंट्यूशन का तो निष्कर्ष में अपना स्थान है ही.
इसी से जुड़ा हुआ प्रश्न है, आज हर क्षेत्र में एआई अपनी पैठ बना रहा है. ऐसे भी बहुत सारे चैटबॉट्स डेवलप हो चुके हैं जो आपसे आपका जन्मतिथि, समय और स्थान जैसी जानकारियॉं लेकर किसी ज्योतिषी की तरह सेकेंडों में आपकी कुंडली बॉंच डालते हैं. हस्तरेखाओं के मामले में ऐसा होने की कितनी गुंजाइश है?
देखिए, मुझे लगता है कि हस्तरेखाओं के मामले में ऐसा होना मुश्किल है. क्योंकि, जो एस्ट्रोलॉजी है वह एस्ट्रोनॉमी और मैथमेटिक्स से जुड़ी हुई है. उसमें ऐसा संभव है. लेकिन, यह ज्यॉमेट्री और बहुत ही जटिल और विविधताओं से भरी संरचनाओं वाला विषय है, इसलिए मैं नहीं समझता कि इसमें एआई की बहुत ज्यादा मदद मिल पाएगी. हालांकि अभी भी ऐसाी सुविधाएं हैं कि हम अपने हाथ को स्कैन कर देते हैं और एनेलेसिस आ जाते हैं. लेकिन मैंने ऐसे एनेलेसिस देखे हैं. ये बहुत ज्यादा सेटिस्फैक्टरी नहीं होते हैं.
श्री आर.एन.मिश्रा जी का एक ज्ञानवर्द्धक एंव बेहद रोचक वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: video
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