ज़िंदगी आहिस्ते से
बदलती है करवट
पूरब में लालिमा लिए
दिन नया मुस्कुराता है....

लम्हा लम्हा 
बदलती हैं तारीख़ें
साल के नये नाम से
उम्मीदों का आँगन भर जाता है....

पेड़ों की शाखों पर
नयी पत्तियाँ आती हैं 
कोई नया फूल खिले तो
चारों ओर सब महक जाता है .....

काले रंग से कोई 
कितना भी डराये फिर भी
काली रात के सीने में 
रुपहला चाँद मुस्कुराता है.....

बाँट लो ज़मीं को 
चाहे धर्म जाति के नाम पर
मुहब्बत का पैगाम
नया आसमान बनाता है....

बरस एक नया देहरी पे खड़ा
उत्सुकता से देख रहा जग को
हमारा हुनर हम क्या लें इससे
ये हमें क्या दे जाता है...

(मूल रूप से छत्तीसगढ़ की  रीमा दीवान चड्ढा एक स्थापित कवयित्री ,लेखिका एवं प्रकाशक हैं, वर्तमान में नागपुर में रहती हैं और अपने प्रकाशन सृजन बिंब द्वारा सौ से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन कर चुकी हैं. सृजन बिंब के माध्यम से उन्होंने दर्जनों नवोदिन लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित कर, उन्हें साहित्य के आकाश में सितारा बनकर चमकने का अवसर प्रदान किया है.)