छठ पर्व पर विशेष 
 

सूर्य भगवान का मण्डल ऋग्वेद है, तनु यजुर्वेद है और किरणें सामवेद हैं तथा वे परमपिता ब्रह्मा का दिन हैं, साथ ही जगत् की उत्पत्ति, विकास और विनाश का कारण हैं। वे अलक्ष्य और अचिंत्यस्वरूप हैं। सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा जी के मुख से “ऊँ” प्रकट हुआ था। वही सूर्य का प्रारम्भिक सूक्ष्म स्वरूप था। इसके बाद “भूः” “भुव:” तथा “स्व:” उत्पन्न हुए। ये तीनों शब्द जब पिंड रूप में “ऊँ” में विलीन हए, तो सूर्य को स्थूल रूप मिला। सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न होने से इनका नाम आदित्य पड़ा।

          ।। सूर्य की गति । षट् मासीय उत्तर ।  शेष दक्खिन ।।

सूर्य की दो गतियाँ हैं - उत्तरायण और दक्षिणायन। छठ पर्व सूर्योपासना का अनुपम महापर्व है जो मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। धीरे-धीरे यह त्यौहार प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ विश्वभर में प्रचलित हो गया है। छठ पूजा सूर्य, प्रकृति, जल, वायु और उनकी बहन छठी म‌इया को समर्पित है। त्यौहार के अनुष्ठान कठोर होने पर भी इस व्रत को स्त्री - पुरुष - बूढ़े - जवान सभी करते हैं। 

पर्यावरण और सामाजिक पहलू
छठ पूजा में कृत्रिमता के बजाय प्राकृतिक चीजों का प्रयोग किया जाता है। पूजा के प्रसाद जैसे ठेकुआ, फल, और गुड़ से बने पकवान आदि घर पर ही बनाए जाते हैं। यह पर्व हमें सामाजिक एकता, पारिवारिक सौहार्द्र, समरसता और पर्यावरण के प्रति सम्मान का संदेश देता है। छठ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता है इसमें इस्तेमाल होने वाली सभी सामग्रियों का पर्यावरण-अनुकूल होना। इसका अनुष्ठान नदी, तालाब, या किसी जलाशय के किनारे होता है जहाँ लोग स्वच्छता और शुद्धता का पूरा ख्याल रखते हैं। व्रती पूजा के दौरान मिट्टी के दीयों का उपयोग करते हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल होता है। इसके अलावा वे बांस की टोकरी, मिट्टी के पात्र, केले के पत्ते, और अन्य प्राकृतिक चीजों का प्रयोग करके पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं कि हमें अपनी प्रकृति का सम्मान करना चाहिए। 

उदयाचलगामी और अस्ताचलगामी सूर्य की आराधना 
हमारी भारतीय संस्कृति में हजारों वर्षों से सुबह उठकर सूर्य अवगाहन करने की अद्भुत परम्परा रही है क्योंकि उस समय सूर्य की सौम्य किरणें शरीर के लिए बहुत उपयोगी होती हैं। सर्दियों के मौसम में तो आवश्यक रूप से धूप स्नान करना ही चाहिए। इसका उद्देश्य है- पिगमेंट प्राप्त करना। पिगमेंट, एक ऐसी हल्की सी परत है जो नियमित रूप से धूप सेवन करने से त्वचा पर स्वत: ही चढ़ जाती है। कहते हैं कि त्वचा पर पिगमेंट जितना गहरा होता है, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता उतनी ही अधिक होती है। सूर्य की धूप में मल, विकार, दुर्गन्ध और विष को दूर करने की अद्भुत क्षमता विद्यमान है। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। उनकी ऋचाओं में अनेक स्थानों पर सूर्यदेव की स्तुति की गई है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है। सूर्य की शक्तियाँ अर्थात् उनकी पत्नियों ऊषा और प्रत्यूषा की संयुक्त आराधना होती है छठ पर्व में। प्रात:काल सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य दिया जाता है। 

लोक-साहित्य में उल्लेख है कि इस महापर्व के दौरान गाए जाने वाले भोजपुरी लोकगीत सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखते हैं और समुदाय में एकता बढ़ाते हैं। प्रातःकाल ही श्रद्धालु गंगा-यमुना आदि पवित्र नदियों, सात समुद्रों, सप्तद्वीप वसुंधरा के पवित्र तीर्थों, पितरों, पूर्वजों एवं देवताओं का स्मरण करते हुए मंत्रोच्चारण के साथ गंगा स्नान करते हैं। साथ ही छाज में सिंदूर, चावल, पान, सुपारी, हल्दी, नारियल आदि रखकर उसे हाथों में लिए जल की धारा में खड़े होकर विधि-विधान से पूजा करते हैं।

भानो ! भास्कर ! मार्तण्ड ! चण्डरस्मै दिवाकर! 
आयुरारोग्यम्  ऐश्वर्यं  मे  देहि  भास्कर!

।। ऊँ श्रीसूर्यनारायणाय स्वामिने नम: ।।

सूर्य मन्दिरों का इतिहास 
कहते हैं कि बिहार में पाल वंश के शासन के दौरान कई मंदिर बनवाए गए थे। इनमें अनेक सूर्य मंदिर भी थे। तो हम मान सकते हैं कि 12वीं सदी के आसपास बिहार में सूर्य की उपासना होती थी, लेकिन संभव है कि छठ जैसा त्योहार उससे भी पहले से मनाया जा रहा हो। 13वीं शताब्दी में आज के गुजरात के इलाक़े में हिमाद्रि ने चतुर्वग चिंतामणि की रचना की थी। इस पुस्तक में अलग-अलग व्रत त्योहारों के बारे में चर्चा की गई है। इसमें हर महीने की 7वीं तिथि को सूर्य को अर्घ्य देने का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त क़रीब 120 साल पहले कन्नौज के गढ़वाल वंश के शासन में एक विद्वान मंत्री हुए थे 'लक्ष्मीधर'। लक्ष्मीधर ने अपनी रचना 'कृत्यकल्पतरू' में सूर्य उपासना का उल्लेख किया है। बिहार के गजेटियर के मुताबिक़ पटना ज़िले के ही इस्लामपुर में मौजूद सूर्य मंदिर और उसके बाहर के तालाब में छठ पर्व मनाने की बड़ी मान्यता रही है। वर्तमान समय में भी लोग दूरदराज़ से  यहां आकर छठ का त्योहार मनाते हैं।

इस अवसर पर जहाँ वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों से पूजन का विधान है, वहीं श्रद्धा भक्ति से लोक-रीति के मंगलगीतों के मध्य सूर्य नारायण को अर्घ्य दान तथा छठी माई की पूजा करते हुए नौजवान, बच्चे खुशी में झूमते हुए फुलझड़ियों एवं आतिशबाजी से प्रकृति का भव्य स्वागत करते हैं। इस दिन अस्ताचलगामी सूर्य की आराधना कर रात्रि के प्रथम प्रहर में श्रद्धालु अपने घरों को लौट जाते हैं, लेकिन विशिष्ट आराधना करने वाले कुछ साधक सारी रात्रि पवित्र नदियों के घाटों पर जप-तप आराधना करते रहते हैं। वहीं दूसरे दिन उदयाचलगामी सूर्य को फल प्रसाद के साथ विशेष अर्घ्य देकर पारायण किया जाता है। इस दिन श्रद्धालु परिवार सहित प्रातः 3 बजे के आसपास घाटों पर एकत्रित होकर जल की निर्मल धारा में खड़े होकर सूर्योपासना करते हैं। 

।। कश्यप पुत्र । जन्मे थे विवस्वान । अदिति गर्भ ।।

जब सूर्य अपनी बालक रूपी प्रथम किरणों के साथ उदयाचल में प्रकट होने लगते हैं तब जलधारा में जोड़ों में खड़े उपासक सूर्य को अर्घ्य प्रदान करते हैं। मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि जब ब्रह्मा जी ने पृथ्वी का निर्माण शुरू किया तो उन्होंने प्रकृति का भी निर्माण किया। इसके बाद देवी प्रकृति ने स्वयं को छह रूपों में विभाजित किया। जिसके छठे अंश को छठी मैया अर्थात्  ब्रह्मा जी की मानस पुत्री के रूप में भी जाना जाता है।

पूजा की चतुर्दिवसीय प्रक्रिया
छठ पूजा में चार दिनों की प्रक्रिया होती है, जिसमें प्रत्येक दिन का अपना धार्मिक महत्व है...
नहाय-खाय : छठ पूजा का पहले दिन व्रती गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कर शुद्धता का संकल्प लेते हैं। इसके बाद वे घर में पूरी पवित्रता से बना शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं।
खरना : दूसरे दिन व्रती दिन भर उपवास रखते हैं और शाम को गुड़ और चावल से बनी खीर, रोटी, और केले का प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है, जो व्रतियों की दृढ़ता और समर्पण का प्रतीक है।
संध्या अर्घ्य : तीसरे दिन शाम के समय डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। यह दृश्य अत्यन्त भावनात्मक होता है, जहाँ चारों ओर दीप जलाए जाते हैं, और लोग गीत गाकर सूर्य देवता का आह्वान करते हैं।
उषा अर्घ्य : चौथे दिन सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस अर्घ्य के बाद व्रत का पारण होता है।

वास्तव में छठ पूजा पारिवारिक प्रेम, सामाजिक एकता, सहयोग, लोक-कला और लोक-संस्कृति का अनोखा संगम है। छठ पूजा को ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है जिसमें संकल्प, भक्ति और तप का विशेष महत्व होता है और इसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है।


(प्रयागराज, उ.प्र. में जन्मी श्रीमती रंजना श्रीवास्तव वर्तमान में भवन्स भगवान दास पुरोहित विद्या मन्दिर, नागपुर में संस्कृत विभागाध्यक्ष एवं प्राथमिक प्रभारी के पद पर कार्यरत हैं। श्रीमद्भगवद्गीता पर “हाँ! मैं आत्मा हूँ” नामक कुण्डलिया शतक और अभिज्ञान शाकुन्तलम् पर दो अलग विधाओ में लिखी पुस्तकों समेत, रंजना की अभी तक 20 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें बाइस्कोप नामक आत्मकथा और जापानी विधा हाइकु में शून्य और सृष्टि तथा धुंध के अलावा की पन्ना धाय के जीवन चरित्र पर एक अंग्रेज़ी अनुवादक के रूप में लिखी बायोग्राफी द कर्स्ड बड विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। रंजना ने "गीली माटी" नामक काव्य संग्रह रचकर, विक्रय की धनराशि से स्नेहांचल वेदना उपशमन केन्द्र, नागपुर के कैंसर पीड़ितों की आर्थिक सहायता भी की है। )