हर साल का पहला दिन, बड़ा उत्तेजना भरा होता है, एक ही दिन पहले की तो बात है कि जब हम पिछले साल में जी रहे थे. लेकिन कुछ ही घंटों में एक साल बदल गया है. एक सदी का चौथाई हिस्सा पीछे छोड़, हम नए क्वार्टर में प्रवेश कर कर चुके हैं.  

यूं तो हर क्षण, हर पल बदलता है. लेकिन, इस वक्त का बदलना किसी क्षण का या पल का बदलना नहीं है. यह बदलना है, जैसे आत्मा पुराने शरीर का चोला उतार कर एक नया चोला पहन रही हो. होने को तो जैसे दिन बदलते हैं, महीने बदलते हैं, वैसे ही साल भी बदलते हैं. लेकिन, एक साल का बदलना इतना साधारण भी नहीं है कि उसे एक दिन या महीने के बदलने के सदृश माना जाए. 

 

 

 

बेशक, एक साल से दूसरे साल की दहलीज पर छलांग में सिर्फ सेकेंड से भी कम का वक्त लगता है. लेकिन, यह सब कुछ बदल देता है. इस बदलाव की प्रक्रिया 31 दिसंबर से कुछ दिन पहले ही शुरू हो जाती है और एक जनवरी के कई दिन बाद तक चलती है. इस प्रक्रिया के दौरान कितना कुछ घट जाता है...बीते साल की समीक्षा, उपलब्धियों के हर्ष, नाकामियों और हादसों के रंज, गलतियों से मिले सबक, कुछ आए-कुछ गए चेहरों की यादों से लेकर नए साल के संकल्पों और योजनाओं तक, पूरी जिंदगी किसी रस्म की तरह, कुछ दिनों के लिए इन्हीं सब के बीच सिमट जाती है. और यह सिमटना, उस विस्तार और पूर्णता के लिए होता है जो हम स्वयं को देना चाहते हैं.

लेकिन, क्या वाकई हम स्वयं को इस हद तक विस्तृत कर पाते हैं कि परिपूर्ण अनुभव कर सकें? अगर ऐसा होता तो हमें खुद को एक ही संकल्प हर साल याद दिलाने की जरूरत न पड़ती. जिंदगी की कील पर टंगे वक्त के कलेंडर साल दर साल बदलते रहते हैं और हम इसी शिकायत के साथ जीते रहते हैं कि वक्त क्यों नहीं बदलता. दिक्कत यह है कि वक्त के बदलाव को हमने हमेशा कलेंडर बदल देना माना है. कभी हमने उस कील को बदलने की कोशिश नहीं की है, जिस पर वो कलेंडर लटकता है. कील तो कील, यह भी मुमकिन है कि कभी हमने कलेंडर की जगह को भी बदलने के बाबत नहीं सोचा हो. 

हम बदलाव की चाहत करते हैं, लेकिन कोशिश नहीं. हम सोचते हैं कि वक्त के साथ-साथ जिंदगी भी बदल जाएगी. बदलती भी है...लेकिन, वैसे नहीं जैसे हम चाहते हैं. वक्त स्वाभाविक तरीके से बदलता है और उसी तरह जिंदगी भी स्वाभाविक तरीके से ही बदलती है. लेकिन यह जिंदगी का बदलना नहीं है, बल्कि बुढ़ाना है. वक्त की तरह जिंदगी भी सतत् प्रवाहमय है. हम जब उसे अपने हिसाब से ढालना चाहते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि बदलाव उसके प्रवाह के साथ बहते हुए नहीं, बल्कि उसके प्रवाह को अपने अनुकूल बनाने के लिए कोशिशों से आते हैं. 

पर अफसोस! हम सारी जिंदगी एक चमत्कार के इंतजार और उम्मीद में  बिता देते हैं. और यही वजह है कि एक ही कील, एक ही दीवार पर गड़े-गड़े हर साल एक नए कलेंडर की साक्षी बनती है और उसमें जंग लगता रहता है. 

हर नए साल में पदार्पण की खुशियों और शुभकामनाओं के आदान—प्रदान के बीच कुछ पल यह सुनिश्चित करने में भी लगाएं कि कहीं हमारेे वक्त का कलेंडर भी तो किसी जंग लगी कील पर नहीं लटकने वाला. यदि ऐसा है, तो स्वयं में इतना जोश तो आप ला ही सकते हैं कि इस कलेंडर को लटकाने के लिए एक नई दीवार में एक नई कील गाड़ सकें.

(image courtesy: muralinath/pixabay.com)