दिल के खोलो द्वार, दिवाली है

छोड़ो यह राग द्वेष, दिवाली है
दिल के खोलो द्वार, दिवाली है

देखो लक्ष्मी सी बेटी बहू घर है
रखो उसका ध्यान, दिवाली है
हर बिटिया के मुख पर मुस्कान 
मन में हो मिठास, दिवाली है

तिरंगे का रहे सदा ऊँचा मान
सरहद पे है जवान, दिवाली है
जिसने खोया है अपना लाल 
उस माँ की कैसी ये दिवाली है

पटाखों का शोर धुआँ हो कम 
बढ़े हरियाली, यह दिवाली है
माटी के दीप का हो उजास
हर मन में प्रकाश, दिवाली है

कोई बच्चा न आज भूखा रहे
देश भर में हो रही दिवाली है
सुख समृद्धि घर घर पहुँचाये
मतवाली मनवाली दिवाली है

धरा अंबर का दूर हो अँधियारा
उजियारा चारों ओर, दिवाली है
उजले मन वालों के घर जा माँ
सच की तभी यह दिवाली है

छोड़ो यह रागद्वेष दिवाली है
दिल के खोलो द्वार, दिवाली है

   (2)

दीये की बाती
कांपती
सकुचाती
शरमाती
बहुत चाहती
फिर भी 
दिल की बात
कहां कह पाती...

(मूल रूप से छत्तीसगढ़ की  रीमा दीवान चड्ढा एक स्थापित कवयित्री ,लेखिका एवं प्रकाशक हैं, वर्तमान में नागपुर में रहती हैं और अपने प्रकाशन सृजन बिंब द्वारा सौ से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन कर चुकी हैं. सृजन बिंब के माध्यम से उन्होंने दर्जनों नवोदिन लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित कर, उन्हें साहित्य के आकाश में सितारा बनकर चमकने का अवसर प्रदान किया है.)