लाखों बच्चे, हवाई जहाज की आवाज सुनकर उसे उड़ता देखने के लिए छत या मैदान की ओर दौड़ते हैं, लेकिन कुछ बच्चों की आकांक्षाएं यहीं पर न रुककर जहाज के साथ—साथ आसमान के विस्तार को नापने निकल पड़ती हैं. ऐसे ही एक बच्चा था नागेश, जिसने बचपन में उड़ते हवाई जहाज देखे और जहाज उड़ाने को ही अपना सपना बना लिया. और आज उन्हें देश के जाने—माने ड्रोन तकनीक विशेषज्ञ के रूप में पहचाना जाता है. 

हाल ही में हमें श्री नागेश प्रभाकर  फरकाड़े जी से लंबी बातचीत का अवसर मिला और उन्होंने अपने इस पैशन और उड्डयन की बारीकियों के बारे में खुलकर बताया. प्रस्तुत है, इस बातचीत के कुछ चुने हुए अंश: 

'उन दिनों एयर ट्रैफिक का इतना ज्यादा चलन नहीं था, जितना आज है. दिन में एकाध बार ही हवाई जहाज उड़ान भरते दिखते थे. हम क्लास में होते थे और जैसे ही हवाई जहाज की आवाज सुनाई देती, सब बच्चे दौड़कर बाहर पहुॅंच जाते. कभी—कभी जहाज की रफ्तार, हमारी रफ्तार से तेज होती और हमें सिर्फ आवाज सुनकर ही संतोष करना पड़ता था. और फिर हम पेपर के प्लेन बनाकर उसे हवा में उड़ाते और उड़ान भरने के रोमांच का आनंद लेते. इसे संयोग कहें या ईश्वर की कृपा, मेरे प्लेन सबसे लंबी दूरी तक उड़ान भरते थे. 

1971—72 के आसपास की बात है, भारत—पाकिस्तान के बीच तनातनी का माहौल था. मेरी उम्र उस समय करीब आठ साल थी. हमें सख्त ताकीद थी कि जैसे ही सायरन की आवाज सुनें, कहीं भी हों, जल्द से जल्द भागकर घर के अंदर पहुॅंच जाएं. एक दिन शाम को मैं छत पर पतंग उड़ा रहा था, अचानक सायरन की आवाज गूंजने लगी. डोरी को खींचकर वापस चकरी पर लपेटने का समय नहीं था. इसलिए, मैंने सोचा कि जो होगा देखा जाएगा और चकरी को छत पर ही अटकाकर पतंग को वैसे ही उड़ता छोड़कर मैं नीचे आ गया. अगले दिन जब वापस छत पर जाकर देखा तो यह देखकर हैरानी और खुशी की सीमा न रही कि पतंग अभी भी हवा में वैसे ही उड़ रही थी. तब पहली बार मुझे एहसास हुआ कि आसमान इतना अजेय नहीं है. 

उन दिनों हम अमरावती में थे. शहर के वीएमवी इंजीनियरिंग कॉलेज में एक विमान प्रदर्शन के लिए लाया गया. पिताजी के साथ मैं भी उसे देखने पहुॅंचा. मैंने उनका हाथ पकड़ा हुआ था. आसमान में उड़ते हवाई जहाज को तो पहले कई बार देखा था, लेकिन यह पहला मौका था, जब मैंने उसे धरती पर उतरते हुए देखा. जैसे ही उसने लैंडिंग की, मैं उसकी गरजदार आवाज और विशाल आकार से बुरी तरह डर गया और उनका हाथ छोड़कर पास ही सूखे नाले में कूद गया. उस जहाज के साथ एक और आकर्षण यह था कि उसमें पॉंच रुपए देकर बैठा जा सकता था. वह यात्रियों को आठ से दस मिनट तक अमरावती के आसमान की सैर कराता था. मैंने पिताजी से जहाज में बैठने की इच्छा जाहिर की, लेकिन पचपन साल पहले पॉंच रुपए एक बहुत बड़ी रकम होती थी. इसलिए, मेरी वह इच्छा उस वक्त अधूरी ही रह गई. 

लेकिन, तेरह साल बाद ही एक ऐसी घटना हुई, जिसने मेरा सारा मलाल दूर कर दिया. हम एनसीसी की एयर विंग सीनियर डिवीजन में ट्रेनिंग ले रहे थे. 1988 में गणतंत्र दिवस के एयरोमॉडलिंग कॉम्पीटिशन के लिए तैयारी कर रहे थे पहले नागपुर,मुंबई और पुणे के बीच कॉम्पीटिशन हुई, जिसमें हमारे सर श्री.गोपालकृष्णन ने हमे सघन प्रशिक्षण दिया और मुकाबले के लिए  तैयार किया. मेहनत रंग लाई और हम यानी नागपुर वाले जीत गये. इस जीत से हमे महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्राप्त हुआ.

दिल्ली में परेड के दौरान,ऑल इंडिया एयरो मॉडेलिंग कॉम्पेटिशन थी जिसमें 25 राज्यों से प्रतिभागियों ने भाग लिया था. मैंने अपने पार्टनर जुबिन खंबाटा के साथ महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व किया था.  दिल्ली में एक महीने का कैंप लगाया गया था. आखिर कॉम्पीटिशन का दिन आ पहुॅंचा. पार्टिसिपेंट्स को तीन मिनट में प्लेन का 3 सीसी का इंजन स्टार्ट कर टेक आॅफ से लेकर हवा में सर्किल बनाना, रोल करना, वर्टिकल लूप बनाने से लेकर सेफ लैंडिंग तक पॉंच अंक हासिल करने थे. लेकिन, करीब 8 पार्टिसिपेंट्स के साथ कोई न कोई समस्या रही. किसी का इंजन ही स्टार्ट नहीं हुआ तो किसी का प्लेन बीच में ही क्रैश हो गया.
 
बाकी सभी ने अच्छा प्रदर्शन किया किन्तु अच्छे नंबर नही मिला पाये, अंत में कनार्टक का एक पार्टिसिपेंट  मुकाबले मे था उसने बाकी सारे टास्क तो पूरे कर लिये. लेकिन, वर्टिकल लूप में उसका इंजन बंद हो गया. मैंने इससे सबक लिया, जब हमारी बारी आयी, तब मै और मेरे पार्टनर ने सभी टास्क पूरे करके और परफेक्ट लैंडिंग कर, पॉंच अंक हासिल किए. जबकि कर्नाटक को तीन अंक मिले थे. इसके लिए हमें तत्कालीन एयर मार्शल डी ए ला फाउंटेन के हाथों गोल्ड मैडल और बेस्ट एयरोमॉडलिंग ट्रॉफी से सम्मानित किया गया. इस तरह हम महाराष्ट्र का नाम राष्ट्रीय स्तर पर रोशन करने में कामयाब रहे. हमारा यह अनुभव बहुतही रोमांचकारी था जिसे मै कभी भुला नही पाऊंगा.

इस बार मुझे प्राइज मनी के रूप में दो हजार रुपए मिले. इनमें दो हजार रुपए मैंने अपनी ओर से डाले और पहली बार खुद का एयरोप्लेन बनाकर कंट्रोल लाइन के माध्यम से उसका कॉलेज में डेमो किया. इसके लिए पेपर में मेरा नाम आया और कॉलेज की ओर से मेरा सत्कार किया गया और मुझे एक हजार रुपए का पारितोषिक प्राप्त हुआ. इसी के कारण दूसरे इंस्टिट्यूशन और कॉलेज भी मुझे डेमो के लिए बुलाने लग गए. 1990 में मुझे तिरपुड़े कॉलेज ने डेमो के लिए बुलाया और बाकायदा दो हजार रुपए मानधन भी दिया. इसी पैसे में कुछ और पैसे मिलाकर मैंने एक साल बाद अपना रिमोट कंट्रोल से आॅपरेट होने वाला प्लेन बना लिया. इसके बाद तो सिलसिला चल निकला और मुझे निरंतर वर्कशॉप और डेमो के लिए निमंत्रण आने शुरू हो गए.

ड्रोन टेक्नोलॉजी, आज हर क्षेत्र में अपनी जगह बना रही है. लेकिन, मैंने अपना पहला ड्रोन 2014 में ही बना लिया था, जबकि यह इतना लोकप्रिय नहीं हुआ था. आज तो यही भविष्य की टेक्नोलॉजी है. मेरे पास आज करीब 30 एयरोप्लेन और 5 स्माल ड्रोन हैं. जिनमें वाईशेप वाले ट्राइकॉप्टर, एक्स शेप वाले क्वार्डकॉप्टर और हेक्सा कॉप्टर, सभी शामिल हैं. 

अपने अनुभव और ज्ञान का लाभ मैं नई पीढ़ी को दे सकूॅं, मेरा हमेशा यही प्रयास रहता है और यही इच्छा भी. इसलिए मैं इस क्षेत्र में हो रहे प्रगति और नवाचारों के बारे में खुद को लगातार अपडेट बनाए रखता हूॅं.  

(जैसा उन्होंने संदीप अग्रवाल को बताया)

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