आइबेरियन पेनिनसुला घीरे-धीरे घूम रहा अपनी जगह से: शोध
लंदन । यूरोप और अफ्रीका के बीच स्थित आइबेरियन पेनिनसुला, जिसमें स्पेन और पुर्तगाल शामिल हैं, अपनी जगह से बहुत ही धीमी गति से घूम रहा है। वैज्ञानिक रिसर्च में सामने आया है कि यह बदलाव इतना सूक्ष्म है कि आम लोग इसे महसूस नहीं कर सकते, लेकिन आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक विश्लेषण के जरिए इसके स्पष्ट संकेत सामने आए हैं। पृथ्वी की सतह से जुड़ी इस अहम खोज ने भूगर्भीय गतिविधियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रिसर्च के मुताबिक आइबेरियन पेनिनसुला घड़ी की दिशा में यानी क्लॉकवाइज रोटेशन कर रहा है। वैज्ञानिकों ने इसके लिए सैटेलाइट आधारित जीएनएसएस ट्रैकिंग स्टेशनों के डेटा और पिछले कई वर्षों के भूकंपों के सिग्नल्स का गहन विश्लेषण किया। इन आंकड़ों से पता चला कि यह क्षेत्र पूरी तरह स्थिर नहीं है, बल्कि बेहद धीमी गति से घूम रहा है। यह रोटेशन प्रति वर्ष एक मिलीमीटर से भी कम है, जिसे इंसानी नजर या रोजमर्रा के अनुभव से महसूस करना असंभव है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी गति इंसान के नाखून बढ़ने की रफ्तार से भी कम है। यह भूगर्भीय बदलाव मुख्य रूप से अफ्रीकी और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट्स के आपसी टकराव का नतीजा माना जा रहा है। ये दोनों प्लेट्स लगातार एक-दूसरे की ओर बढ़ रही हैं और उनके बीच का दबाव आइबेरियन पेनिनसुला पर असर डाल रहा है।
यह पेनिनसुला इन दोनों विशाल प्लेट्स के बीच फंसे एक ब्लॉक की तरह है, जिस पर दबाव समान रूप से नहीं पड़ता। इसी असमान दबाव के कारण यह क्षेत्र सीधा खिसकने के बजाय हल्का सा घूम रहा है। जिब्राल्टर जलडमरूमध्य के आसपास का इलाका इस प्रक्रिया में खास भूमिका निभा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार जिब्राल्टर आर्क एक तरह से बफर की तरह काम करता है, जो टेक्टोनिक दबाव को कुछ हद तक सोख लेता है। आर्क के पूर्वी हिस्से में तनाव अपेक्षाकृत कम है, जबकि पश्चिमी हिस्से में प्लेट्स का टकराव ज्यादा सीधा और मजबूत है। इसी वजह से आइबेरियन पेनिनसुला का दक्षिणी और पश्चिमी हिस्सा रोटेशन के संकेत ज्यादा साफ दिखाता है। वहीं इसका उत्तरी हिस्सा यूरेशियन प्लेट से अधिक मजबूती से जुड़ा हुआ माना जाता है। इस खोज के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या भविष्य में इससे भूकंप का खतरा बढ़ सकता है।
वैज्ञानिकों ने फिलहाल किसी तत्काल या बड़े खतरे की चेतावनी नहीं दी है। उनका कहना है कि रोटेशन की गति बहुत धीमी है और तनाव लंबे समय में धीरे-धीरे रिलीज होता रहता है। हालांकि यह अध्ययन उन इलाकों की पहचान करने में मददगार साबित हो सकता है, जहां भूगर्भीय तनाव जमा हो रहा है और जहां भूकंप के झटके पहले भी महसूस किए जाते रहे हैं। रिसर्च से वैज्ञानिकों को जमीन के नीचे मौजूद अदृश्य फॉल्ट लाइनों को बेहतर तरीके से समझने और मैप करने में मदद मिलेगी।
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