राष्ट्रीय एकात्मता और सरदार वल्लभभाई पटेल पर दो दिवसीय राष्ट्रीय एकता संगोष्ठी

नागपुर, 7 अगस्त : सरदार पटेल को याद करने का अर्थ है - भारत और भारतीय संस्कृति को याद करना। भारत के भौगोलिक और सांस्कृतिक महत्व को सरदार पटेल बहुत गहराई से समझते थे। अखंड भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए उन्होंने भरसक प्रयत्न किए।वे स्वतंत्र, एकीकृत भारत के शिल्पकार थे। यह बात हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला के कुलाधिपति पद्मश्री डॉ. हरमहेंद सिंह बेदी ने कही। वे हिन्दी विभाग, राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली तथा शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय एकात्मता की संकल्पना और सरदार वल्लभभाई पटेल विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय एकता संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को सम्बोधित कर रहे थे। इस अवसर पर मंच पर राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय की कुलगुरु डॉ. माधवी खोडे चवरे, अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय, बिलासपुर के कुलगुरु प्रो. ए. डी. एन. वाजपेयी, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला के वरिष्ठ अध्येता प्रो. बृजेंद्र पांडेय, नागपुर विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय के अधिष्ठाता प्रो. शामराव कोरेटी तथा हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय उपस्थित थे।

इस अवसर पर संगोष्ठी विषयक स्मारिका, विद्यार्थी- दृष्टि तथा डॉ. मनोज पाण्डेय द्वारा सम्पादित समिधा नामक शोध पत्रिका के प्रथम अंक का विमोचन मंचासीन अतिथियों के हाथों किया गया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलगुरु डॉ. माधवी खोडे चवरे ने कहा कि भारतीय होने की अनुभूति ही हमारे राष्ट्रीय एकात्मता का परिचायक है। सरदार पटेल की दृढ़ता और एकता का मंत्र हमारे लिए ऐतिहासिक धरोहर है। इस विचार को पीढ़ी दर पीढ़ी ले जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एकात्मता के विचारों के बीज का वटवृक्ष बनना आवश्यक है। 

बीज वक्तव्य देते हुए भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला के वरिष्ठ अध्येता प्रो. बृजेंद्र पांडेय ने इतिहास विषयक पाश्चात्य दृष्टि और भारतीय दृष्टि पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सरदार पटेल ने स्वतंत्र भारत को विषम स्थिति से उभारा था। सरदार पटेल संवेदनशील, दृढ़ प्रतिज्ञ, कर्तव्य-निष्ठ और निःस्पृह थे। प्रमुख अतिथि अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय, बिलासपुर के कुलगुरु प्रो. ए.डी.एन.वाजपेयी ने कहा कि सरदार पटेल ने बिना रक्तपात के ५६५ देसी रियासतों को स्वतंत्र भारत का अंग बनाया। प्रो. वाजपेयी ने जोर देकर कहा कि भारतवर्ष ईश्वरीय सत्ता है। एकोहम बहुस्यां बहुधा वंदति' यही राष्ट्रीय एकात्मता का मंत्र है। वास्तव में आध्यात्मिक एकता ही राष्ट्रीय एकात्मता है। वहीं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की राष्ट्रीय महिला कार्य संयोजिका शोभाताई पैठणकर ने कहा कि राष्ट्रीय एकता के लिए सभी नागरिकों को कटिबद्ध होना होगा, यही सरदार पटेल के प्रति हमारी श्रद्धांजलि होगी।

कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय ने कहा कि भौगोलिक दृष्टि से भारत में विविधता है किंतु भाव एक है। राष्ट्रीय एकात्मता के सरदार के सपने के समक्ष आज भी अनेक चुनौतियां हैं। स्वागत भाषण में मानविकी संकाय के अधिष्ठाता डॉ.शामराव कोरेटी ने कहा कि हमारा राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान, राष्ट्रीय चिह्न अशोक स्तंभ आदि सभी हमारी राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं। कार्यक्रम का संचालन सहयोगी प्राध्यापक डॉ. संतोष गिरहे ने किया। 

प्रथम संवाद सत्र राष्ट्रीय एकात्मता की चुनौतियां विषय पर केंद्रित था। सत्र की अध्यक्षता मध्यप्रदेश शासन के पूर्व अपर मुख्य सचिव मनोज श्रीवास्तव ने की। उन्होंने कहा कि सरदार पटेल ने राष्ट्रीय चरित्र को एक आकार दिया। प्रमुख वक्ता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. मनोज राय और इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के डीन डॉ. राजन यादव थे।

दूसरे सत्र का विषय 'राष्ट्रीय संप्रभुता -एकता का महत्व ' था। इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र मुक्त विश्वविद्यालय नासिक के प्र-कुलगुरु प्रो. जोगेंद्र सिंह बिसेन ने कहा कि राष्ट्रीय एकता सदैव इस राष्ट्र की पहचान रही है। आज इसे बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्प और सामर्थ्य का परिचय देना होगा। सत्र के प्रमुख वक्ता डॉ. संजय जोशी, गुजरात शासन के प्रशासनिक अधिकारी एवं राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, नागपुर के प्रोफेसर डॉ. मधुकर शर्मा थे।

इस अवसर पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा राज्यों से आए प्राध्यापक, शोधार्थी तथा नगर के गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।