रूस के खिलाफ अपनी रक्षा मजबूत करने के लिए यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की जर्मनी से ‘Taurus’ क्रूज़ मिसाइल पाने को बेताब हैं. उन्हें उम्मीद है कि जर्मनी के नए चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ सत्ता संभालते ही इस सौदे को मंजूरी देंगे. यह सौदा यूक्रेन के लिए बेहद अहम है, खासकर रूस के खिलाफ लंबी दूरी की मारक क्षमता बढ़ाने के लिहाज से.

कीव में जर्मनी की निवर्तमान विदेश मंत्री एनालेना बेयरबॉक से मुलाकात के दौरान जब जेलेंस्की से पूछा गया कि क्या मर्ज़ इस फैसले पर तेजी से काम करेंगे, तो उन्होंने सीधे जवाब देने से बचते हुए कहा, “हम इस पर काम कर रहे हैं.” लेकिन जब उनसे दोबारा पूछा गया कि क्या वह आश्वस्त हैं, तो उन्होंने कहा, “हां, बिल्कुल… यह सिर्फ उम्मीद से थोड़ा ज्यादा है.”

CDU की नीति और मर्ज़ की रणनीति
बेयरबॉक ने स्पष्ट किया कि वह निवर्तमान मंत्री होने के कारण नई सरकार की नीति पर कुछ नहीं कह सकतीं. हालांकि, उन्होंने याद दिलाया कि मर्ज़ की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स (CDU) संसद में हमेशा यूक्रेन को लंबी दूरी के हथियार देने की वकालत करती रही है.

फरवरी में, मर्ज़ ने यह साफ नहीं किया था कि उनकी सरकार Taurus मिसाइलों की आपूर्ति करेगी या नहीं. लेकिन उन्होंने कहा था कि यूक्रेन को अपनी रक्षा के लिए आवश्यक हथियार मिलने चाहिए. उनका बयान था, “चाहे वह Taurus हो या कोई और प्रणाली, हमें अपने यूरोपीय सहयोगियों के साथ समन्वय करना होगा।”

Taurus मिसाइल की ताकत क्या है?
Taurus जर्मनी की सेना के सबसे ताकतवर हथियारों में से एक है. यह एक क्रूज़ मिसाइल है, जिसकी खासियत इसकी 500 किलोमीटर (300 मील) की जबरदस्त रेंज और बंकर-भेदी वारहेड है. इसे फाइटर जेट से लॉन्च किया जा सकता है और यूक्रेन इसे रूस के उन ठिकानों पर हमला करने के लिए चाहता है, जहां से रूसी सेना लगातार बमबारी कर रही है.

तो जर्मनी इसे देने से क्यों डर रहा है?
Taurus खासतौर पर रूस के S-400 और Pantsir एयर डिफेंस सिस्टम को मात देने के लिए बनाई गई है. बर्लिन को डर है कि अगर यह मिसाइल यूक्रेन के हाथों से रूसियों के कब्जे में चली गई, तो वे इसकी तकनीक समझकर इसका तोड़ निकाल सकते हैं. इससे भी ज्यादा खतरा यह है कि अगर कोई Taurus मिसाइल बिना फटे रूस में गिर गई, तो रूस इसे रिवर्स-इंजीनियर करके खुद का संस्करण बना सकता है.

सिर्फ यही नहीं, यह मिसाइल जर्मनी के पास मौजूद इकलौता डीप-स्ट्राइक हथियार है, जिससे दुश्मन के इलाके में दूर तक हमला किया जा सकता है. यही वजह है कि बर्लिन इसे देने से पहले हर पहलू पर सोच-विचार करता रहा है.

क्या बदलेगी जर्मनी की नीति?
पूर्व चांसलर ओलाफ शोल्ज़ (SPD) ने लगातार Taurus मिसाइलें भेजने का विरोध किया. उनका तर्क था कि इससे जर्मनी सीधे युद्ध में शामिल हो सकता है, मर्ज़ भी इस बात को लेकर सचेत हैं और पहले कह चुके हैं कि “जर्मनी युद्ध में पक्षकार नहीं बन सकता.”

अब सबकी नजरें अप्रैल के मध्य तक बनने वाली नई जर्मन सरकार पर टिकी हैं, जब मर्ज़ अपने गठबंधन को अंतिम रूप देंगे. क्या वह यूक्रेन की इस मांग को पूरा करेंगे या शोल्ज़ की नीति को जारी रखेंगे? इसका फैसला आने वाले हफ्तों में होगा.