लंबे समय के सहयोगी देशों में बढ़ी अनबन, अमेरिका-इजरायल रिश्ते चर्चा में
तेलअवीव: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीतियों के कारण अब अमेरिका और उसके सबसे भरोसेमंद सहयोगी इजरायल के बीच भी मतभेद उभरने लगे हैं। ट्रंप की हालिया चीन यात्रा के तुरंत बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और वियतनाम की ओर से आए बयानों ने दोनों देशों के बीच बढ़ती कूटनीतिक दूरी की पुष्टि कर दी है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अमेरिका पर अपनी सैन्य निर्भरता को लेकर न केवल खुलकर बात की है, बल्कि भविष्य में इसे धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म करने का भी इरादा जताया है। उनके इस रुख ने वैश्विक राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
सैन्य आत्मनिर्भरता की ओर इजरायल का बड़ा कदम
दशकों से अमेरिका से अरबों डॉलर की सैन्य और आर्थिक मदद पाने वाला इजरायल अब इस बैसाखी को छोड़ने की तैयारी कर रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के हालिया बयानों ने इस चर्चा को तेज कर दिया है कि क्या इजरायल वास्तव में अमेरिकी रक्षा सहायता के बिना अपनी सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर सकता है। अमेरिकी मीडिया को दिए इंटरव्यू में नेतन्याहू ने साफ कहा कि अब वह समय आ चुका है जब इजरायल को अमेरिकी सैन्य सहायता के दायरे से बाहर निकलना चाहिए और अपनी रक्षा जरूरतों को खुद पूरा करने के लिए आत्मनिर्भर बनना चाहिए।
ऐतिहासिक रक्षा समझौता और अमेरिकी मदद के आंकड़े
नेतन्याहू का यह बयान इसलिए बेहद हैरान करने वाला है क्योंकि इजरायल की पूरी रक्षा प्रणाली काफी हद तक अमेरिकी फंडिंग पर टिकी है। वर्तमान में वर्ष 2016 में हुए एक 10 वर्षीय समझौते के तहत अमेरिका हर साल इजरायल को 3.8 अरब डॉलर की भारी-भरकम सैन्य सहायता देता है। इस समझौते की शर्त यह भी है कि इस रकम का एक बड़ा हिस्सा इजरायल को अमेरिकी हथियार और सैन्य उपकरण खरीदने पर ही खर्च करना होता है। आंकड़ों की बात करें तो 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद से अब तक अमेरिका उसे 300 अरब डॉलर से अधिक की आर्थिक और सैन्य मदद दे चुका है, जो इतिहास में किसी भी देश को मिली सबसे बड़ी सहायता है।
अमेरिकी जनमत में बदलाव और सप्लाई चेन का संकट
इजरायल द्वारा इस नीतिगत बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका के घरेलू राजनीतिक माहौल में आ रहा बदलाव है। हालिया वैश्विक सर्वे बताते हैं कि गाजा और क्षेत्र में हुए युद्ध के बाद अमेरिकी नागरिकों, विशेषकर युवाओं और वहां के विश्वविद्यालयों में इजरायल के प्रति नकारात्मक राय तेजी से बढ़ी है। सैन्य इतिहासकारों का मानना है कि नेतन्याहू इस बदलते राजनीतिक मिजाज को भांप चुके हैं और वह भविष्य में अमेरिकी सहायता बंद होने की स्थिति में किसी भी बड़े झटके से बचने के लिए इजरायल को पहले से तैयार करना चाहते हैं। इसके अलावा, हालिया युद्धों के दौरान हथियारों की अचानक बढ़ी मांग और सप्लाई चेन (आपूर्ति श्रृंखला) में आई दिक्कतों ने भी इजरायल को अपने स्थानीय हथियार उद्योग को मजबूत करने और कच्चे माल के भंडार तैयार करने पर मजबूर किया है।
कूटनीतिक विशेषज्ञों का आकलन और व्यावहारिक चुनौतियां
हालांकि, कूटनीतिक और रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में वॉशिंगटन से पूरी तरह नाता तोड़ लेना इजरायल के लिए व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। अमेरिका से पूरी तरह अलग होना भले ही अभी मुमकिन न हो, लेकिन बदलते वैश्विक और राजनीतिक समीकरणों ने तेल अवीव को नए विकल्पों पर सोचने के लिए मजबूर जरूर कर दिया है। इजरायल अब अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को बढ़ाने के लिए स्थानीय रक्षा उत्पादन पर करीब 110 अरब डॉलर खर्च करने की योजना बना रहा है, ताकि आने वाले दशक में अमेरिकी इमदाद को घटाकर 'शून्य' पर लाया जा सके।
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